राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय पार्टियों की मान्यता देने के खिलाफ दायर याचिका खारिज
पारुल नरेश
- 09 Jan 2026, 10:43 PM
- Updated: 10:43 PM
नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की ओर से राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियों के रूप में मान्यता दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता ‘हिंद साम्राज्य पार्टी’ ने चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 की वैधता को चुनौती दी थी, जिसके तहत राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
न्यायमूर्ति नितिन डब्ल्यू सांब्रे और न्यायमूर्ति अनीश दयाल की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने उन मुद्दों को फिर से उठाया है, जिनका उच्चतम न्यायालय पहले ही निपटारा कर चुका है। उसने कहा कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश को किसी भी वैधानिक शक्ति से रहित या भेदभावपूर्ण मानने का कोई कारण नहीं है।
याचिकाकर्ता एक पंजीकृत राजनीतिक दल है। उसने दलील दी थी कि निर्वाचन आयोग किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टी के रूप में मान्यता प्रदान करने के लिए अधिकृत नहीं है।
याचिकाकर्ता ने कहा था कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश के उपभाग 6ए, 6बी और 6सी में इस तरह का दर्जा देने के लिए निर्धारित मानदंड अनुचित और निराधार थे।
याचिकाकर्ता ने कहा था कि राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार के लिए चुनाव चिह्न चुनाव से काफी पहले ही आवंटित होते हैं, जबकि “नवगठित राजनीतिक दल” के उम्मीदवारों को नामांकन पत्रों की जांच की तारीख के बाद ही चिह्न मिलता है, जिससे उनके पास बहुत कम समय बचता है।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही फैसला दे चुकी है कि चुनाव चिह्न के आवंटन का दावा मौलिक अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता है।
उसने कहा कि इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 324 और चुनाव संचालन नियमों के नियम 5 और 10 के तहत निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के उद्देश्य से चिह्न चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश तैयार करने की शक्ति दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि कानून अनुच्छेद 324 के संवैधानिक आदेश के अनुसार राजनीतिक दलों के “वर्गीकरण” का प्रावधान करता है।
उसने कहा कि शीर्ष अदालत के मुताबिक, निर्वाचन आयोग ने अपने विवेक से यह निर्णय लिया था कि किसी राजनीतिक दल को मान्यता देने के लिए, उसके लिए पहले राज्य की राजनीति में एक निश्चित मानदंड हासिल करना जरूरी है तथा यह अनुचित नहीं था।
उच्च न्यायालय ने कहा, “ऐसे में याचिका खारिज की जाती है।”
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसे चुनाव के हर चरण में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि मौजूदा राजनीतिक दल, जिन्हें अवैध रूप से राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के रूप में मान्यता दी गई है, खुद को हासिल विशेष अधिकारों और सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि पंजीकृत राजनीतिक दलों के बीच कोई भेदभाव नहीं हो सकता, क्योंकि राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दल की अवधारणा संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन के प्रावधानों के विपरीत है।
उसने कहा था, “उपभाग 6ए, 6बी और 6सी में शामिल प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के मूल सिद्धांत के साथ-साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा के भी खिलाफ हैं, जो भारत के संविधान की मूलभूत विशेषताओं में से एक है।”
भाषा पारुल