अन्याय कभी स्थायी नहीं हो सकता : 19 साल बाद कोलकाता वापसी पर बोलीं तसलीमा नसरीन
पवनेश
- 01 Aug 2026, 10:27 PM
- Updated: 10:27 PM
कोलकाता, एक अगस्त (भाषा) निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने शनिवार को कहा कि लगभग दो दशक बाद कोलकाता लौटना इस बात का सबूत है कि "अन्याय लंबा तो हो सकता है, लेकिन स्थायी नहीं"। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई हमेशा महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए रही है, न कि किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष या विरोध में।
शहर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भावुक तसलीमा ने घर वापसी को उस शहर से लंबे समय के निजी निर्वासन का अंत बताया, जिसे वह अपना घर मानती हैं।
तसलीमा (63) ने कहा, "कोलकाता वापस आकर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं जिंदगी के उस हिस्से में लौट आई हूं जिसे मैं यहीं छोड़ गई थी।"
लेखिका को 2007 में शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। इससे पहले 1994 में, अपनी लेखनी और धर्म पर अपने विचारों की वजह से कट्टरपंथी समूहों से मिली जान से मारने की धमकियों के कारण उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था।
निर्वासन में बिताए अपने लंबे समय को याद करते हुए लेखिका ने कहा कि उन्हें ऐसे भविष्य की उम्मीद है जहां किसी भी लेखक को अपनी बात कहने के लिए अपना देश छोड़ने पर मजबूर न होना पड़े।
उन्होंने कहा, "मेरी वापसी यह साबित करती है कि अन्याय लंबा तो हो सकता है, लेकिन स्थायी नहीं हो सकता। मैं उस दिन का सपना देखती हूं जब किसी भी लेखक को कभी अपने देश से निर्वासित न होना पड़े।"
इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकियों के कारण बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर होने के बाद यूरोप में रहने वाली तसलीमा ने कहा कि वह किसी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो रही हैं।
उन्होंने कहा,"मैं यहां किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ से या किसी पार्टी के खिलाफ बोलने के लिए नहीं आई हूं। मैं यहां महिलाओं के अधिकारों के लिए बोलने आई हूं।"
धार्मिक कट्टरपंथ के प्रति अपने पुराने विरोध को दोहराते हुए तसलीमा ने कहा, "मैं हर तरह के कट्टरपंथ के खिलाफ हूं, लेकिन मैंने इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज उठाई है क्योंकि मैंने इसे बचपन से ही बहुत करीब से देखा है।"
बांग्लादेश के हालात पर चिंता जाहिर करते हुए लेखिका ने आरोप लगाया कि वहां धार्मिक कट्टरपंथ बढ़ रहा है और अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार खतरा मंडरा रहा है।
लेखिका ने कहा, "बांग्लादेश में कट्टरपंथ का बढ़ना चिंताजनक स्तर पर है। अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित किया जा रहा है।"
उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे भविष्य की उम्मीद है जहां बांग्लादेश में महिलाएं और धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित और सम्मान के साथ रह सकें।
कोलकाता से दूर रहने के लिए मजबूर किए जाने के दर्द को याद करते हुए तसलीमा ने कहा कि वह उन हालात को कभी नहीं भूलीं, जिनके कारण उन्हें 2007 में शहर छोड़ना पड़ा था।
उन्होंने कहा, "आज इस दरवाजे का खुलना यह साबित करता है कि अन्याय लंबा तो हो सकता है, लेकिन स्थायी नहीं हो सकता। इतिहास याद रखता है कि किसने दरवाज़े बंद किए और किसने उन्हें खोला।"
बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका 2004 से 2007 के बीच कोलकाता में रही थीं। उस समय की वाम मोर्चा सरकार ने उन्हें शहर छोड़ने के लिए कहा था, क्योंकि उनकी आत्मकथा 'द्विखंडितो' के कुछ हिस्सों को लेकर हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुए थे।
भावुक होते हुए तसलीमा ने कहा कि वह वाक्य कहने में उन्हें लगभग दो दशक लग गए, जिसे कहने की वह लंबे समय से चाहत रखती थीं।
उन्होंने कहा, "ये शब्द कहने में मुझे 19 साल लग गए: 'मैं कोलकाता लौट आई हूं।' मैंने हर दिन एक पता खोने का दर्द महसूस किया।"
अगस्त को अपनी ज़िंदगी का सबसे अहम महीना बताते हुए तसलीमा ने कहा कि अब यह महीना न सिर्फ उनके जन्म और देश-निकाले का, बल्कि उनकी वापसी का भी प्रतीक बन गया है।
उन्होंने कहा, "आठ अगस्त 1994 को तत्कालीन सरकार ने मुझे बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। बस सात दिनों में मेरे देश-निकाले के 32 साल पूरे हो जाएंगे। सरकार ने भले ही मुझे मेरे देश से दूर कर दिया हो, लेकिन वह मेरे अंदर से मेरे देश को कभी नहीं निकाल पाई।"
बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल कहीं भी स्थायी घर नहीं मिल सकने पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा, "यूरोप ने मुझे नागरिकता और रहने की जगह दी है, लेकिन खेद की बात है कि दोनों बंगाल में मुझे रहने के लिए एक छोटी सी जगह भी नहीं मिल पाई।"
लेखिका का कहना था कि उन्हें कभी किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया, फिर भी अपने विचार व्यक्त करने के लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी।
उन्होंने कहा, "किसी भी अदालत ने मुझे कभी सजा नहीं दी, लेकिन कट्टरपंथियों की वजह से मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी।"
उन्होंने धर्म के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार की भी आलोचना की।
उन्होंने कहा, "जो लोग अपनी बेटियों की आज़ादी को तो अपना अधिकार मानते हैं, लेकिन मुस्लिम बेटियों के लिए मध्ययुगीन रीति-रिवाजों को सही ठहराते हैं, वे मुस्लिम समुदाय के दोस्त नहीं हैं।"
दक्षिण एशिया में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का समर्थन करते हुए तसलीमा ने तर्क दिया कि धर्म पर आधारित पर्सनल लॉ महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं और लैंगिक न्याय तथा आधुनिक लोकतंत्र के लिए समानता पर आधारित एक समान नागरिक संहिता जरूरी है।
उन्होंने कहा, "असली टकराव धर्मनिरपेक्षता और कट्टरपंथ के बीच, तर्कसंगत सोच और अतार्किकता के बीच, नयी सोच और परंपरा के बीच, और आज़ादी को महत्व देने वाले और उसे महत्व न देने वाले लोगों के बीच है।"
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प्रशांत पवनेश
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