न्यायालय ने कांस्टेबल की बर्खास्तगी पर कहा: नौकरी का इस्तेमाल धोखाधड़ी के लिए नहीं किया जाए
माधव
- 08 May 2026, 08:42 PM
- Updated: 08:42 PM
नयी दिल्ली, आठ मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने धोखाधड़ी और दोहरे रोजगार के आरोपी झारखंड पुलिस के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए शुक्रवार को कहा कि सार्वजनिक सेवा और खासतौर पर पुलिस बल में नौकरी का इस्तेमाल धोखाधड़ी करने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले में, आरोपी रंजन कुमार को 18 मई 2005 को झारखंड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था। धुरकी पुलिस थाने में रिजर्व गार्ड के रूप में सेवा करने के दौरान उसे 20 दिसंबर 2007 की दोपहर से 23 दिसंबर 2007 तक दो दिनों का प्रतिपूर्ति अवकाश दिया गया था, लेकिन वह ड्यूटी पर नहीं लौटा और अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहा था।
इस दौरान, कुमार ने कथित तौर पर जाली प्रमाण पत्रों और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करके संतोष कुमार के नाम से बिहार पुलिस में कांस्टेबल के पद पर नियुक्ति प्राप्त कर ली। यह भी आरोप है कि बिना किसी सूचना या पूर्व अनुमति के, उसने 6 जनवरी 2008 को पटना जिला पुलिस में अपनी ड्यूटी छोड़ दी।
बाद में हुई जांच में पता चला कि रंजन कुमार और संतोष कुमार एक ही व्यक्ति हैं।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि पुलिस कर्मी से उच्चतम स्तर की सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और अनुशासन बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सेवा में प्रवेश के समय धोखाधड़ी सार्वजनिक रोजगार की मूल भावना पर प्रहार करती है।
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री उचित रूप से स्थापित करती है कि आरोपी ने पुलिस सेवा में दो नियोक्ताओं से नौकरी पाने के लिए जानबूझकर छल-प्रपंच किया।
पीठ ने कहा, ''सार्वजनिक रोजगार, विशेषकर पुलिस सेवा को, धोखाधड़ी का जरिया नहीं बनाया जा सकता। यदि कानून लागू करने का दायित्व संभालने वाले व्यक्ति स्वयं छल और फर्जी प्रमाण पत्रों के माध्यम से सेवा में प्रवेश करते हैं, तो इससे कानून का शासन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचेगा।''
न्यायालय ने कहा, ''इन परिस्थितियों में, अनुशासनात्मक कार्रवाई को बहाल करते हुए, कानून के अनुसार आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश देना आवश्यक और उपयुक्त है।''
पीठ ने यह भी कहा कि विभागीय जांच आपराधिक मुकदमे नहीं हैं।
न्यायालय ने कहा कि मामले में, प्रतिवादी संख्या 1 को आरोप पत्र की प्रति दी गई, संबंधित साक्ष्य उपलब्ध कराए गए, अपना बचाव करने की अनुमति दी गई, जांच रिपोर्ट दी गई और विभागीय स्तर पर उसकी सुनवाई की गई।
शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि आरोपी के खिलाफ आरोप -- पहचान बदलने, धोखाधड़ी, जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल, पुलिस विभागों में दोहरी नौकरी और अनधिकृत अनुपस्थिति से संबंधित हैं, इसलिए ऐसे कर्मी को सेवा में बनाए रखना संस्थागत अनुशासन, जनता के विश्वास और पुलिस बल की विश्वसनीयता के लिए पूरी तरह से नुकसानदेह होगा।
पीठ ने कहा कि उसके खिलाफ पारित बर्खास्तगी का आदेश एक निष्पक्ष और वैध जांच से उत्पन्न एक न्यायसंगत प्रशासनिक कदम था।
न्यायालय ने कहा, '' बिहार के पुलिस महानिदेशक और झारखंड के पुलिस महानिदेशक यह सुनिश्चित करेंगे कि मामले की जांच सक्षम क्षेत्राधिकार वाले पुलिस प्राधिकार द्वारा की जाए और कानून के अनुसार उपयुक्त कदम उठाए जाएं।''
भाषा
सुभाष माधव
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