वाम शक्ति के मैदान से भगवा राज्याभिषेक तक: बंगाल की राजनीति में नए मोड़ के लिए 'ब्रिगेड' तैयार
माधव
- 08 May 2026, 09:35 PM
- Updated: 09:35 PM
(तस्वीरों के साथ)
कोलकाता, आठ मई (भाषा) टेलीविजन स्टूडियो द्वारा चुनावी परिदृश्य को समझने और सोशल मीडिया द्वारा राजनीति को विभिन्न तरीकों से पेश किए जाने से बहुत पहले, बंगाल में राजनीतिक शक्ति का माप 'ब्रिगेड परेड ग्राउंड' में उमड़ने वाली भीड़ के माध्यम से किया जाता था।
पश्चिम बंगाल की राजधानी के मध्य में स्थित इस विशाल मैदान में 1950 के दशक से, सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव, बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान और वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ जैसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक हस्तियां कार्यक्रमों में भाग लेती रही हैं।
शुक्रवार को, भारतीय सेना के स्वामित्व वाले मैदान (इस मैदान का दूसरा नाम) में, काले मानसूनी बादलों के नीचे, श्रमिकों ने वर्षा रोधी विशाल हैंगर खड़े किए और पुलिसकर्मियों ने सुरक्षा ग्रिड स्थापित कीं।
ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेजों का कभी सैन्य परेड मैदान रहा यह स्थान बंगाल के उथल-पुथल भरे राजनीतिक इतिहास में एक वैचारिक परिवर्तन का साक्षी बनने के लिए तैयार है।
कभी वाम मोर्चे की शक्ति का प्रतीक रहा ब्रिगेड परेड ग्राउंड कांग्रेस विरोधी प्रदर्शनों का केंद्र बना और बाद में ममता बनर्जी के भाजपा विरोधी प्रदर्शनों का मंच बन गया। यह अब बंगाल की पहली भाजपा सरकार के शपथग्रहण समारोह की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है।
अगर बंगाल में चुनाव सत्ता का फैसला करते हैं, तो 'ब्रिगेड' द्वारा अक्सर इसे वैधता प्रदान की जाती है।
पीढ़ियों से, प्रतिष्ठित विक्टोरिया मेमोरियल के बगल में स्थित विशाल हरा-भरा क्षेत्र राज्य के मुख्य राजनीतिक रंगमंच के रूप में कार्य करता रहा है - जहां राजनीतिक दल संगठनात्मक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं, नेता जनता के मूड का परीक्षण करते हैं, और शासन व्यवस्थाएं अपनी अपरिहार्यता का प्रदर्शन करती हैं।
शनिवार शाम तक, जब भाजपा नेतृत्व समर्थकों की भारी भीड़ के सामने शपथ लेगा, तो ब्रिगेड के राजनीतिक इतिहास में एक और अध्याय जुड़ जाएगा।
इसका प्रतीकात्मक महत्व स्पष्ट है। 1970 के दशक के उत्तरार्ध से ही, माकपा ने ब्रिगेड रैलियों को बंगाल की सड़क राजनीति का केंद्र बना दिया। विशाल वार्षिक रैलियों के दौरान मैदान लाल झंडों के सागर में तब्दील हो जाता था, जिससे उस पार्टी की आभा और भी मजबूत होती थी जिसने अंततः 34 वर्षों तक राज्य पर निर्बाध शासन किया।
दशकों तक, ब्रिगेड स्टेडियम में भीड़ का आकार बंगाल की राजनीतिक मुद्रा बना रहा। मैदान जितना भरा होता था, संदेश उतना ही सशक्त होता था। लेकिन 'ब्रिगेड' की स्मृति वामपंथी युग से कहीं आगे तक फैली हुई है।
इस क्षेत्र की राजनीतिक पौराणिक कथाओं को न केवल बंगाल के नेताओं ने बल्कि वैश्विक राजनीति हस्तियों ने भी आकार दिया। 1955 में, सोवियत नेताओं निकिता ख्रुश्चेव और निकोलाई बुल्गानिन की यहाँ एक बड़ी जनसभा हुई। यह वह दौर था जब कोलकाता भारत की समाजवादी कल्पना का केंद्र था।
कई वर्षों बाद, बांग्लादेश के जन्म के बाद, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के साथ 'ब्रिगेड' मंच साझा किया, जब नए राष्ट्र के उदय के जश्न में पूरे मैदान में 'जय बांग्ला' और 'जयहिंद' के नारे गूंज रहे थे।
वर्ष 1984 में, ज्योति बसु, एन टी रामाराव और फारूक अब्दुल्ला जैसे विपक्षी दिग्गज राष्ट्रीय राजनीति को नया आकार देने के उद्देश्य से आयोजित एक बड़े कांग्रेस विरोधी सम्मेलन के लिए यहां एकत्रित हुए थे।
साल 2005 में, वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने ब्रिगेड में वाम मोर्चा की रैली को संबोधित किया, जिससे इस स्थल की प्रतिष्ठा एक ऐसे मंच के रूप में रेखांकित हुई जहां बंगाल की राजनीति अक्सर दुनिया भर की व्यापक वैचारिक धाराओं के साथ प्रतिध्वनित होती है।
दशकों बाद, जनवरी 2019 में, ममता बनर्जी ने 'ब्रिगेड' में विपक्षी नेताओं को एकत्र किया किया और भाजपा विरोधी एक रैली का आयोजन किया, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की कवायद के रूप में पेश किया गया।
और अब, बंगाल की राजनीति में भाजपा इसी जमीन को सत्ता के औपचारिक प्रवेश द्वार में बदलने की तैयारी कर रही है, जो कभी राज्य में चुनावी रूप से हाशिए पर रहा करती थी।
कोलकाता के एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, ''बंगाल की हर प्रमुख राजनीतिक शक्ति ने 'ब्रिगेड' के माध्यम से भावनात्मक और प्रतीकात्मक वैधता हासिल करने की कोशिश की है। भाजपा स्पष्ट रूप से संदेश देना चाहती है कि बंगाल के राजनीतिक केंद्र में बदलाव आया है।''
इस परिवर्तन की शुरुआत महीनों पहले ही हो गई थी जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से कुछ समय पहले 14 मार्च को 'ब्रिगेड' में एक विशाल रैली को संबोधित किया था।
भाषा
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