ग्रैच्युटी, बचे अवकाश का भुगतान कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया लागत का हिस्सा नहीं: एनसीएलएटी
अजय
- 20 Jul 2026, 09:49 PM
- Updated: 09:49 PM
नयी दिल्ली, 20 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने डंकन इंडस्ट्रीज के एक पूर्व कर्मचारी की अपील खारिज कर दी है। कर्मचारी ने अपनी ग्रैच्युटी और 'लीव एनकैशमेंट' यानी बची हुई छुट्टियों के बदले बकाया पैसे को ऋण शोधन समाधान प्रक्रिया लागत मानकर प्राथमिकता के आधार पर भुगतान करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
एनसीएलएटी की तीन सदस्यीय पीठ ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की कोलकाता पीठ के पहले के आदेश को बरकरार रखा। एनसीएलटी की कोलकाता पीठ ने सितंबर, 2024 में डंकन इंडस्ट्रीज के पुराने प्रबंधन के एक पूर्व निदेशक की याचिका खारिज कर दी थी।
अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि ऐसे बकाये का निपटान कंपनी की मंजूर समाधान योजना के अनुसार किया जाना चाहिए।
न्यायाधिकरण ने कहा, ''दिवाला समाधान प्रक्रिया लागत (आईआरपीसी) का मतलब असल में वे खर्च हैं जो समाधान पेशेवर दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान करता है, लेकिन जिनका भुगतान बाद में किया जाता है। हालांकि, जब धारा 53 के फॉर्मूले के तहत भुगतान होता है, तो प्राथमिकता के क्रम में इनका भुगतान सबसे पहले किया जाता है।''
ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता (आईबीसी) की धारा 53 'वॉटरफॉल' व्यवस्था को अनिवार्य बनाती है। यह एक सख्त कानूनी फॉर्मूला है जो यह तय करता है कि परिसामपन यानी कंपनी बंद होने पर संपत्ति की बिक्री से मिली रकम कर्जदाताओं में किस प्राथमिकता के क्रम में बांटी जाएगी।
एनसीएलएटी ने कहा, ''साफ तौर पर, ग्रैच्युटी का भुगतान करने की जिम्मेदारी ऐसा खर्च नहीं है जो समाधान पेशेवर ने वास्तव में किया हो। असल में, यह कर्मचारी को उसके सेवानिवृत्ति या निश्चित अवधि के बाद नौकरी छोड़ने पर मिलने वाले लाभ के तौर पर मिलता है। इसलिए, इसकी तुलना दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान कर्मचारी को देय वेतन से भी नहीं की जा सकती है।''
सुबीर मुखर्जी ने 30 अप्रैल, 2021 को सेवानिवृत्त होने से पहले 25 साल से अधिक समय तक डंकन इंडस्ट्रीज में काम किया था। कॉरपोरेट ऋण शोधन समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) के दौरान सेवानिवृत्त हुए मुखर्जी ने 83.58 लाख रुपये से अधिक के बकाये का दावा किया था।
समाधान पेशेवर ने दावे को आंशिक रूप से स्वीकार किया था और बाद में ग्रैच्युटी की रकम को संशोधित करके 52.82 लाख रुपये कर दिया था, लेकिन समाधान योजना लागू होने तक भुगतान रोक दिया था।
इसके बाद, मुखर्जी ने एनसीएलटी में अपील दायर कर समाधान पेशेवर को सीआईआरपी लागत के तौर पर यह रकम जारी करने का निर्देश देने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि उनके कानूनी बकाया को समाधान प्रक्रिया पर निर्भर नहीं किया जा सकता।
एनसीएलटी ने सितंबर, 2024 में उनकी याचिका खारिज कर दी। उसके बाद उन्होंने अपीलीय न्याधिकरण में अपील दायर की।
हालांकि, अपीलीय न्यायाधिकरण ने भी इसे खारिज कर दिया और कहा कि धारा 5 (13) में सीआईआरपी लागत की पूरी परिभाषा दी गई है। इसमें सिर्फ वे खर्च शामिल हैं जो समाधान पेशेवर ने समाधान प्रक्रिया के दौरान असल में किए हैं। इसमें अंतरिम वित्त, समाधान पेशेवर के शुल्क और संबंधित कंपनी को चालू हालत में बनाए रखने का खर्च शामिल है।
न्यायाधिकरण ने कहा कि ग्रैच्युटी कर्मचारी को नौकरी खत्म होने पर मिलने वाला लाभ है और इसकी तुलना ऐसे खर्चों या सीआइआरपी अवधि के दौरान दिए गए वेतन से नहीं की जा सकती।
अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा, ''हमें लगता है कि अपीलकर्ता का दावा गलत आधार पर किया गया है और कानून की दृष्टि में टिकने वाला नहीं है। इसलिए, इस अपील में कोई दम न होने के कारण इसे खारिज किया जाता है।''
भाषा रमण अजय
अजय
2007 2149 दाहोद