एनसीईआरटी ने संशोधित पाठ्यपुस्तक जारी की, न्यायपालिका पर विवादित अध्याय में बदलाव
दिलीप
- 07 Jul 2026, 05:25 PM
- Updated: 05:25 PM
नयी दिल्ली, सात जुलाई (भाषा) न्यायपालिका को कथित तौर पर बदनाम करने को लेकर विवाद खड़ा होने के कुछ महीनों बाद, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा आठवीं की सामाजिक विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक जारी की है, जिसमें विवादित हिस्सों को हटा दिया गया है।
संशोधित पाठ्यपुस्तक में विवादित हिस्सों के साथ-साथ अदालतों में लंबित मामलों और दो महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों से जुड़े संदर्भों को हटा दिया गया है। वहीं, इसमें जनहित याचिका, न्यायाधिकरणों और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से संबंधित नयी सामग्री जोड़ी गई है।
अध्याय की शुरुआत में दिए गए ''बड़े सवाल'' खंड में भी बदलाव किया गया है। वापस ली गई पाठ्यपुस्तक में छात्रों से पूछा गया था कि स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों आवश्यक है, जबकि संशोधित अध्याय में अब यह प्रश्न किया गया है कि ''न्यायपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण समाज'' के लिए न्याय क्यों महत्वपूर्ण है।
''न्यायिक व्यवस्था के समक्ष चुनौतियां'' शीर्षक वाला खंड पूरी तरह हटा दिया गया है। इस हिस्से में अदालतों में लंबित मामलों के ''भारी बोझ'' का उल्लेख किया गया था और इसके लिए न्यायाधीशों की कमी, जटिल प्रक्रियाओं तथा कमजोर बुनियादी ढांचे को जिम्मेदार बताया गया था।
इसके अलावा, ''न्यायपालिका में भ्रष्टाचार'' नाम का हिस्सा भी हटा दिया गया है, जिसमें भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई का जिक्र था कि उन्होंने न्यायिक व्यवस्था में ''भ्रष्टाचार और कदाचार'' के मामलों को स्वीकार किया था।
फरवरी में एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में ''न्यायपालिका में भ्रष्टाचार'' खंड को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।
उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पाठ्यपुस्तक की मुद्रित और डिजिटल प्रतियां वापस ले ली गई थीं और एनसीईआरटी ने इस मामले में माफी भी मांगी थी।
शीर्ष अदालत ने उक्त पाठ्यपुस्तक के किसी भी प्रकार के आगे के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल प्रसार पर ''पूर्ण प्रतिबंध'' लगा दिया था। अदालत ने कहा था कि इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित ''आपत्तिजनक'' सामग्री शामिल है।
संशोधित पाठ्यपुस्तक के आभार खंड में कहा गया है कि इसका प्रकाशन उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में की गई समीक्षा प्रक्रिया के बाद किया गया है।
इसमें यह भी कहा गया है कि 16 मार्च के आदेश के जरिए उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति ने अध्याय 4, ''समाज में न्यायपालिका की भूमिका'' को ''फिर से लिखा'' है।
वापस ली गई पाठ्यपुस्तक को तैयार करने वाली टीम में 51 सदस्य शामिल थे। संशोधित संस्करण में 48 सदस्य हैं। इसमें अध्याय के लिए प्रारंभिक रूप से जिम्मेदार ठहराए गए मिशेल डेनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार के नाम हटा दिए गए हैं।
भाषा आशीष दिलीप
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