अदालत ने विसरा रिपोर्ट आरोपियों को मुहैया नहीं कराने पर वर्ष 1989 की दोषसिद्धि को रद्द किया
संतोष
- 07 Jul 2026, 06:00 PM
- Updated: 06:00 PM
प्रयागराज, सात जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दहेज हत्या के मामले में तीन लोगों को वर्ष 1989 में दोषी ठहराए जाने के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अगर पूछताछ के दौरान विसरा रिपोर्ट आरोपियों के समक्ष कभी नहीं रखी गई तो इस रिपोर्ट को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जयकृष्ण उपाध्याय की पीठ ने तीन जुलाई को दिए अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि आरोपी को प्राथमिक वैज्ञानिक साक्ष्य (विसरा रिपोर्ट) से वंचित रखा जाता है तो उससे पीड़ित को जहर दिए जाने के संबंध में महज सवाल करना पर्याप्त नहीं होगा।
अदालत ने पति, उसके पिता और भाई द्वारा दायर अपील स्वीकार कर ली जिसमें 1986 में दहेज की मांग को लेकर एक महिला को कथित तौर पर जहर देकर मारने के संबंध में 1989 में दोषी ठहराए जाने के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
मौजूदा मामले में, अभियोजन पक्ष ने विसरा रिपोर्ट को आधार बनाया था जिसमें मृतक महिला के पेट, आंत, किडनी और तिल्ली में कीटनाशक "जिंक फॉस्फेट" की उपस्थिति का संकेत था।
हालांकि, अधीनस्थ अदालत में सुनवाई के दौरान भारतीय दंड संहिता की धारा 313 के तहत आरोपियों का बयान दर्ज किया गया था। लेकिन अधीनस्थ अदालत इस विशेष रिपोर्ट को आरोपियों के समक्ष पेश कराने में नाकाम रही थी।
अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा, "यही नहीं, हमने पाया कि ना तो विसरा और ना ही इससे जुड़ी रिपोर्ट को कभी आरोपी व्यक्तियों के समक्ष पेश किया गया। भले ही जहर दिए जाने के संबंध में सवाल पूछे गए, विसरा और इसकी रिपोर्ट के संबंध में कोई सवाल नहीं पूछे गए।"
अदालत ने असरफ अली बनाम असम सरकार, 2008 और चंदन पासी बनाम बिहार सरकार, 2025 के मामलों में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को आधार बनाया जिसमें कहा गया था कि यदि आरोपी के खिलाफ साक्ष्य में एक बिंदु महत्वपूर्ण है तो दोषसिद्धि उस पर आधारित होनी चाहिए। यह उचित होगा कि आरोपी से उस मामले में सवाल पूछा जाना चाहिए और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
इन निर्णयों में यह निष्कर्ष भी निकाला गया कि यदि साक्ष्य का एक आवश्यक हिस्सा आरोपी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो उसे विचार से पूरी तरह से बाहर रखना आवश्यक है और वह दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता।
अदालत ने पाया कि विसरा रिपोर्ट के संरक्षण के लिए रजिस्टर में कोई प्रविष्टि नहीं थी और यह सील करने वाले डॉक्टर से सीएमओ के पास कैसे पहुंचा, यह गवाही देने के लिए कोई जिम्मेदार गवाह पेश नहीं किया गया और ना ही किसी फॉरेंसिक विशेषज्ञ ने यह पुष्टि की कि यह बिना किसी छेड़छाड़ के सीलबंद लिफाफे में प्राप्त हुआ।
इस प्रकार से उच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए पति, उसके पिता और भाई को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
भाषा सं राजेंद्र संतोष
संतोष
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