कभी नक्सल प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगलों में कॉफी की खेती की तैयारी
अजय
- 07 Jul 2026, 05:15 PM
- Updated: 05:15 PM
रायपुर, सात जुलाई (भाषा) कभी धुर नक्सल प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र में अब बड़े पैमाने पर कॉफी की खेती शुरू करने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के वन क्षेत्रों में आजीविका संवर्धन, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य से जिला प्रशासन ने एक बेहद अनूठी पहल की है। बस्तर के इस अंचल में अब बड़े पैमाने पर कॉफी की खेती शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
उन्होंने बताया कि इस सिलसिले में नारायणपुर जिले के कलेक्टर ने भारत सरकार के कॉफी बोर्ड के विशेषज्ञों के साथ कुतुल, कच्चापाल, कोडलियार, ईरकभट्टी और तोके सहित आस-पास के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों का विस्तृत जमीनी निरीक्षण किया।
अधिकारियों ने बताया कि निरीक्षण के दौरान कॉफी बोर्ड के विशेषज्ञ दल ने क्षेत्र की जलवायु, वार्षिक वर्षा, तापमान, मिट्टी की प्रकृति और समुद्र तल से ऊंचाई का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया। बोर्ड के अधिकारियों ने पुष्टि की कि अबूझमाड़ का प्राकृतिक वातावरण कॉफी उत्पादन के लिए पूरी तरह अनुकूल है। यहां 'कॉफी आधारित कृषि वानिकी मॉडल' विकसित कर बड़े पैमाने पर स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ा जा सकता है।
उन्होंने बताया कि विशेषज्ञों के अनुसार, कॉफी के पौधों का करीब चार वर्षों तक रखरखाव करने के बाद व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाता है। इसके बाद यह ग्रामीणों के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी नियमित आय का जरिया बनेगा। इस पूरी परियोजना में स्थानीय स्वयं-सहायता समूहों और ग्रामीणों की सीधी भागीदारी तय की जाएगी, जिससे हर परिवार के कम से कम एक सदस्य को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सके।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य अबूझमाड़ के अनुकूल प्राकृतिक वातावरण का सही उपयोग करना, वनों का संरक्षण करना और स्थानीय ग्रामीणों को आय का एक स्थायी व मजबूत जरिया देना है। प्रारंभिक चरण में भूमि का चयन कर स्थानीय स्तर पर नर्सरी की शुरुआत की जा रही है।
अधिकारियों ने बताया कि कॉफी बोर्ड के अधिकारियों के सुझाव पर कलेक्टर ने जिले के कृषि अधिकारियों और कर्मचारियों को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए उड़ीसा के कोरापुट भेजने का निर्देश दिया है। वहां अधिकारी कॉफी उत्पादन, पौध प्रबंधन, पर्यावरणीय आवश्यकताओं और तकनीकी पहलुओं की बारीकियों को सीखेंगे, ताकि वे आकर स्थानीय किसानों का मार्गदर्शन कर सकें।
भाषा संजीव जितेंद्र अजय
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