पहली बार वाराणसी पहुंचे नक्सल प्रभावित रहे गांव के लोग, काशी की रंगत ने किया मंत्रमुग्ध
नरेश
- 30 Jun 2026, 05:31 PM
- Updated: 05:31 PM
(तस्वीरों सहित)
वाराणसी (उप्र), 30 जून (भाषा) चंदौली जिले के पांडी गांव की दर्जनों महिलाओं और बच्चों ने सोमवार को पहली बार अपने गांव की सीमाएं लांघकर शहर की दुनिया देखी। कभी नक्सल प्रभावित रहे इस गांव के लोगों ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए, शॉपिंग मॉल में घूमे और पहली बार एस्केलेटर पर कदम रखते हुए उसे अपनी बोली में 'चलने वाला सीढ़ी' नाम दिया।
वाराणसी शहर से महज 80 किलोमीटर दूर होने के बावजूद इन ग्रामीणों के लिए यह किसी शहर का पहला सफर था। आज सड़क बनने के बाद यह दूरी तीन घंटे से भी कम समय में तय हो जाती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब यह सफर गांव के लोगों के लिए लगभग नामुमकिन था।
वाराणसी परिक्षेत्र पुलिस की सामुदायिक पुलिसिंग और 'मिशन शक्ति' के तहत दूरस्थ पांडी गांव से करीब 50 ग्रामीणों को वाराणसी भ्रमण पर लाया गया जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे।
इस पहल की शुरुआत तब हुई, जब वाराणसी परिक्षेत्र के पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) वैभव कृष्ण कुछ दिन पहले पांडी गांव पहुंचे थे।
बातचीत के दौरान कई महिलाओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन हनुमान मंदिर और वाराणसी के अन्य धार्मिक स्थलों के दर्शन की अपनी इच्छा जताई। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने कभी शहर नहीं देखा। सोमवार को उनकी यह इच्छा पूरी हो गई।
पुलिस की बस से ग्रामीणों ने काशी विश्वनाथ मंदिर, विशालाक्षी देवी मंदिर, दुर्गा कुंड मंदिर और संकट मोचन हनुमान मंदिर में दर्शन किए। इसके बाद पुलिस ने उनके लिए जलपान की व्यवस्था की और फिर सभी को जेएचवी मॉल ले जाया गया, जहां उन्होंने पहली बार आधुनिक शहरी जीवन को करीब से देखा।
जगमगाती दुकानें, वातानुकूलित परिसर और सबसे ज्यादा एस्केलेटर ने सभी का ध्यान खींचा।
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कई ग्रामीण आश्चर्य से उसे देखते रहे और फिर सावधानी से उस पर कदम रखा। कुछ ने मुस्कुराते हुए उसे 'चलने वाली सीढ़ी' नाम दिया।
नौगढ़ के पुलिस क्षेत्राधिकारी नामेंद्र कुमार ने पीटीआई भाषा को बताया कि 2019-20 के दौरान जनपद को नक्सल प्रभाव से मुक्त घोषित कर दिया गया था।
काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के बाद विमला देवी ने कहा, ''मैं पहली बार किसी शहर में आई हूं। बहुत अच्छा लगा।''
पुष्पा ने कहा, ''गांव तो अच्छा लगता है, लेकिन यह शहर बहुत बड़ा है।''
कलावती ने बताया कि उनके गांव से करीब 50 लोग इस यात्रा पर आए थे।
बारहवीं तक पढ़ी पुनिता कुमारी ने कहा, ''मैं हमेशा जानना चाहती थी कि शहर कैसा होता है। आज बनारस और मंदिरों के दर्शन करके बहुत अच्छा लग रहा है। शहर गांव से बिल्कुल अलग है।''
सुनीता ने मुस्कुराते हुए कहा, ''आज बहुत कुछ नया देखा, जो पहले कभी नहीं देखा था।''
समूह में शामिल राम सकल ने कहा कि कभी उनका इलाका नक्सल प्रभावित था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
उन्होंने कहा, ''काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा करना बहुत अच्छा अनुभव रहा। शहर तो शहर होता है... गांव से उसकी क्या तुलना?''
मीडिया से बात करते समय झिझक रहे ग्रामीण मंदिर परिसर में पहुंचते ही उत्साह से भर उठे। 'हर-हर महादेव' के जयकारों का उन्होंने पूरे जोश के साथ हाथ उठाकर जवाब दिया।
डीआईजी वैभव कृष्ण ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि यह पहल 'मिशन शक्ति' के तहत शुरू की गई है।
उन्होंने कहा, ''हमारा उद्देश्य उन महिलाओं और बच्चों को शहरी जीवन से परिचित कराना था, जिन्होंने कभी शहर नहीं देखा। इससे वे बेहतर जीवन और बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित होंगे।''
उन्होंने कहा, ''अगर इस प्रयास से दो बच्चे या दो महिलाएं भी बेहतर भविष्य के लिए प्रेरित होती हैं, तो हम इसे अपनी सफलता मानेंगे।''
शाम करीब साढ़े सात बजे सभी ग्रामीण सुरक्षित पांडी गांव लौट गए।
यात्रा के दौरान करीब 12 साल के एक बच्चे ने साथ चल रहे पुलिस निरीक्षक सूर्य प्रकाश मिश्रा से कहा, ''मैं खूब पढ़ाई करूंगा और फिर शहर आऊंगा।''
पुलिस के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य समुदाय के साथ भरोसा मजबूत करना और दूर-दराज के इलाकों के लोगों को नयी संभावनाओं से जोड़ना है।
पांडी गांव के लोगों के लिए यह यात्रा केवल तीर्थदर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसे अपने गांव से बाहर एक नयी दुनिया और नए सपनों की पहली झलक भी बन गई।
भाषा किशोर आनन्द खारी नरेश
नरेश
3006 1731 वाराणसी