अदालत ने न्यायिक अधिकारी को 'मोह-पाश' में फंसाने के आरोपी की ज़मानत याचिका खारिज की
रंजन
- 12 Jun 2026, 08:00 PM
- Updated: 08:00 PM
नयी दिल्ली, 12 जून (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने हरियाणा की एक न्यायिक अधिकारी को 'मोह-पाश' में फंसाने और डेटिंग ऐप के ज़रिए उससे 52 लाख रुपये से ज़्यादा की धोखाधड़ी करने के आरोपी व्यक्ति की ज़मानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि इस मामले में रोमांटिक साइबर धोखाधड़ी के ''सभी लक्षण'' मौजूद हैं और ऐसा लगता है कि आरोपी अहम सबूत छिपा रहा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललेर मामले में दीपक वत्स की ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहे थे।
दीपक वत्स को दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ की आईएफएसओ इकाई द्वारा धोखाधड़ी, किसी और रूप में पहचान बताने तथा आपराधिक साज़िश से जुड़े प्रावधानों के तहत दर्ज एक ई-प्राथमिकी के सिलसिले में गिरफ़्तार किया था।
अदालत ने नौ जून के एक आदेश में कहा, ''जांच अभी शुरुआती चरण में है और जांच के कई अहम पहलू अब भी अनसुलझे हैं। इस समय आरोपी को रिहा करने से जांच को पूरा करने में बाधा आ सकती है।''
इसने कहा कि भले ही शिकायत घरेलू सहायिका दीक्षा देवी के नाम पर दर्ज कराई गई थी, लेकिन पैसों के लेन-देन के रिकॉर्ड से पता चला कि लगभग सभी अंतरण हरियाणा की न्यायिक अधिकारी हर्षाली चौधरी के बैंक अकाउंट से किया गया, जो ''असली पीड़ित'' हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने टिंडर पर 'अभिमन्यु वशिष्ठ' बनकर चौधरी से दोस्ती की और खुद को एक खुफिया सरकारी विभाग का अधिकारी बताया। उस पर आरोप है कि उसने ज़्यादा मुनाफ़े का लालच देकर पीड़िता से 52.81 लाख रुपये हड़प लिए।
अदालत ने कहा कि आरोपी की ओर से रिकॉर्ड पर रखी गई व्हाट्सऐप चैट से एक रोमांटिक रिश्ते का पता चलता है और यह चैट पीड़िता की ओर से किए गए कई वित्तीय लेन-देन से काफी हद तक मेल खाती है।
न्यायाधीश ने कहा, ''इस अदालत की राय में, जिस तरह से वित्तीय लेन-देन और व्हाट्सऐप पर हुई बातचीत में एकदम सटीक तालमेल दिख रहा है, उससे 'मोह-पाश' की आशंका को बल मिलता है।''
हालांकि, अदालत ने जांच के तरीके पर भी चिंता जताई और कहा कि पीड़ित पक्ष से अहम इलेक्ट्रॉनिक सबूत एकत्र नहीं किए गए। इसने रेखांकित किया कि आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद टिंडर रिकॉर्ड, व्हाट्ट्सऐप चैट, कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल सबूत हासिल नहीं किए गए।
न्यायाधीश ने शिकायतकर्ता (एक घरेलू सहायिका) द्वारा कथित तौर पर जमा कराए गए पांच लाख रुपये नकद के बारे में अभियोजन पक्ष की दलील पर सवाल उठाए और कहा कि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा, ''पीड़िता एक कार्यरत न्यायिक अधिकारी है। अगर आरोपी को रिहा किया जाता है, तो इस बात का जोखिम है कि वह न्यायिक अधिकारी से संपर्क करे या उसे प्रभावित करे, या फिर निजी सामग्री का इस्तेमाल करके उस पर दबाव बनाने की कोशिश करे-भले ही यह अप्रत्यक्ष रूप से हो। यह एक ऐसा पहलू है जिसे अदालत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।''
साथ ही, अदालत ने पाया कि आरोपी ने जानबूझकर सिर्फ़ चौधरी के भेजे गए संदेश ही पेश किए, जबकि अपनी बातचीत को छिपाए रखा और अपने ज़ब्त किए गए मोबाइल फ़ोन का पासवर्ड देने से भी इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा, ''आरोपी को 52 लाख रुपये से ज़्यादा की रकम मिली है, जिसमें से ज़्यादातर हिस्सा सीधे और आसानी से पता लगाए जा सकने वाले तरीके से न्यायिक अधिकारी के अकाउंट से आया है, जो इस मामले में असली पीड़िता हैं। बैंक स्टेटमेंट में पैसे का लेन-देन पूरी तरह साफ़ है।''
इसने जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि वह चौधरी के पूरे व्हाट्सऐप और टिंडर रिकॉर्ड हासिल करें तथा उन्हें सुरक्षित रखें।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जांच अधिकारी दोनों पक्षों के बीच कथित मुलाकातों की पुष्टि करें, पांच लाख रुपये नकद जमा करने के स्रोत की जांच करें और उन संस्थाओं की भी जांच करें जिनके ज़रिए कथित तौर पर पैसे का कुछ हिस्सा भेजा गया था।
भाषा
नेत्रपाल रंजन
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