धार्मिक रीति-रिवाजों पर सवाल उठाने से धर्म और सभ्यता के विघटन का खतरा होगा: न्यायालय
नरेश
- 07 May 2026, 03:17 PM
- Updated: 03:17 PM
नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को टिप्पणी की कि यदि लोग धार्मिक प्रथाओं या धर्म से जुड़े मामलों पर संवैधानिक अदालत में सवाल उठाने लगेंगे तो विभिन्न रीति-रिवाजों और परंपराओं पर सवाल उठाने वाली सैकड़ों याचिकाएं दायर होंगी जिससे धर्मों और सभ्यता के विघटन का खतरा पैदा हो जाएगा।
नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ महिलाओं के साथ धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है। इनमें केरल के शबरिमला मंदिर से जुड़ा मामला भी शामिल है। साथ ही, यह पीठ दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार कर रही है।
पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर कर 1962 के उस फैसले को रद्द करने की मांग की थी जिसने बॉम्बे बहिष्कार निवारण अधिनियम, 1949 को निरस्त कर दिया था - इस कानून के तहत समुदाय के किसी भी सदस्य का बहिष्कार करना अवैध था।
संविधान पीठ के 1962 के फैसले में कहा गया था, "दाऊदी बोहरा समुदाय की धार्मिक आस्था और सिद्धांतों से यह स्पष्ट है कि धार्मिक आधार पर इसके धार्मिक प्रमुख द्वारा बहिष्कार की शक्ति का प्रयोग धर्म संबंधी मामलों में इसके कामकाज के प्रबंधन का हिस्सा था और 1949 के अधिनियम ने ऐसे बहिष्कार को भी अमान्य घोषित करके संविधान के अनुच्छेद 26(ख) के तहत समुदाय के अधिकार का उल्लंघन किया।"
सुधारवादी दाऊदी बोहरा समुदाय के एक समूह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि किसी व्यक्ति के धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक आचरण के जवाब में अपनाई जाने वाली किसी प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता। इसलिए उसे संविधान के अनुच्छेद 26 के अंतर्गत 'धर्म से संबंधित मामला' भी नहीं माना जा सकता।
अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत से कहा कि कोई प्रथा भले ही धार्मिक पहलू रखती हो, लेकिन यदि उसका मौलिक अधिकारों पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 या अनुच्छेद 26 के तहत प्रतिबंधों से पूरी तरह छूट नहीं दी जा सकती।
इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि हर कोई कुछ धार्मिक प्रथाओं या धर्म से जुड़े मामलों को संवैधानिक अदालत में चुनौती देने लगे तो ''इस सभ्यता का क्या होगा, जहां धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है।''
उन्होंने कहा, ''इस अधिकार या उस अधिकार को चुनौती देने वाली, मंदिर खोलने और मंदिर बंद करने के अधिकार को लेकर सैकड़ों याचिकाएं दायर की जाएंगी। हम इस बात से अवगत हैं।''
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा, ''हर धर्म विघटित हो जाएगा और हर संवैधानिक अदालत को बंद करना पड़ेगा।''
उन्होंने कहा, '' यदि दो पक्षों के बीच विवादों को अनुमति दी जाती है, तो हर कोई हर चीज़ पर सवाल उठाने लगेगा...।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि भारत को अन्य क्षेत्रों से अलग करने वाली बात यह है कि इतनी विविधताओं और बहुलताओं के बावजूद "हम एक सभ्यता हैं"।
भाषा शोभना नरेश
नरेश
0705 1517 दिल्ली