ईसी कानून के खिलाफ याचिकाओं की सुनवाई टालने से न्यायालय का इनकार; कहा- मामला ज्यादा महत्वपूर्ण
अविनाश
- 06 May 2026, 06:53 PM
- Updated: 06:53 PM
नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केंद्र सरकार की उस याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें 2023 के उस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई टालने की मांग की गई थी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और दो उप-आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को हटा दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला शबरिमला मामले से भी 'अधिक महत्वपूर्ण' है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ वर्तमान में केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उस अनुरोध को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह शबरिमला मामले की सुनवाई में व्यस्त हैं, इसलिए इस मामले को स्थगित किया जाए।
न्यायमूर्ति दत्ता ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाले वर्तमान मामले की गंभीरता का उल्लेख करते हुए कहा, ''यह मामला किसी भी अन्य मामले से अधिक महत्वपूर्ण है।''
उन्होंने कहा, ''आपके (सॉलिसिटर जनरल के) सहयोगी आज नोट ले लें। याचिकाकर्ता अपनी दलीलें शुरू करें। सभी मामले महत्वपूर्ण हैं। हमने अखबारों में पढ़ा है कि एक टिप्पणी है कि शबरिमला से जुड़ी जनहित याचिका पर अदालत को विचार नहीं करना चाहिए था। इसलिए, पूरे सम्मान के साथ कहें तो नौ न्यायाधीश एक ऐसे मामले में व्यस्त हैं, जिसे लेकर यह भी कहा जा रहा है कि इसे पहले ही सुनवाई के लिए नहीं लिया जाना चाहिए था।''
इसके बाद पीठ ने सुनवाई जारी रखते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अपनी दलीलें बृहस्पतिवार तक समाप्त करें। इसने केंद्र सरकार को बाद की तारीख पर अपनी दलीलें रखने की अनुमति दी।
इससे पहले 20 मार्च को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने इन याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। उन्होंने कहा था, ''मुझ पर हितों के टकराव का आरोप लगाया जाएगा, (क्योंकि) इसमें हितों का टकराव है।''
यह कानून दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित किया गया था, जो उस महत्वपूर्ण फैसले के कुछ महीनों बाद आया था, जिसमें शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश शामिल हों।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक कोई कानून नहीं बन जाता।
वर्ष 2023 के नये कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) शामिल होते हैं।
जनहित याचिकाओं में कहा गया है कि इस समिति से प्रधान न्यायाधीश को बाहर करना नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
इस कानून को कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है, जिनमें कांग्रेस नेता जया ठाकुर और गैर-सरकारी संगठन 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (एडीआर) शामिल हैं।
इससे पहले केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में 2023 कानून के तहत दो नये चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का बचाव किया था और कहा था कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता चयन समिति में न्यायिक सदस्य की मौजूदगी पर निर्भर नहीं करती।
मार्च 2023 में पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सलाह पर की जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश शामिल होंगे।
भाषा सुरेश अविनाश
अविनाश
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