आईपीएल का क्रिकेट प्रेमियों और विशेषज्ञों से सवाल: क्या टी20 में यॉर्कर खत्म हो गई है?
सुधीर
- 05 May 2026, 05:23 PM
- Updated: 05:23 PM
(एमआर मिश्रा)
नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) एक समय था जब टी20 मैच के आखिरी ओवरों की एक जानी पहचानी कहानी होती थी। जैसे-जैसे बल्लेबाजी करने वाली टीम दबाव बढ़ाती और मैच का समीकरण मुश्किल होता जाता था तब कप्तान उन खास गेंदबाजों की तरफ देखते थे जो क्रिकेट के सबसे बड़े दबाव हटाने वाले हथियार 'यॉर्कर' को फेंकने में माहिर होते थे।
लेकिन आईपीएल के इस दौर में जब 220 से अधिक के स्कोर आसान हो गए हैं। बल्लेबाज पहले से सोचे-समझे रैंप शॉट और रिवर्स स्कूप के अलावा क्रीज पर कहीं भी खड़े होकर खेलने को तैयार रहते हैं, ऐसे में कभी बल्लेबाजों में खौफ पैदा करने वाली यॉर्कर आज अपनी सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रही है।
ड्रेसिंग रूम और प्रशंसकों के बीच होने वाली चर्चाओं में अब यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि क्या इस लीग में बल्लेबाजी में आए बड़े बदलावों ने यॉर्कर को खत्म कर दिया है? क्या यॉर्कर अब एक ऐसी जोखिम वाली गेंद बन गई है जिससे गेंदबाज दूर ही रहना पसंद करते हैं? ऐसा बिल्कुल नहीं है। जानकारों का कहना है कि हम अभी यॉर्कर के खत्म होने की बात नहीं कह सकते।
वह गेंद जिसने कभी लसिथ मलिंगा के दौर को पहचान दी थी और जिसे बुमराह ने और भी बेहतरीन बनाया था, आज भी जिंदा है। बस अब बल्लेबाजों के दबदबे वाले इस दौर में क्रिकेट के सबसे बड़े 'फिनिशिंग हथियार' बने रहने के लिए इस गेंद को फेंकने में और भी अधिक हिम्मत और सटीकता की जरूरत होती है।
पूर्व भारतीय ऑलराउंडर मदनलाल ने पीटीआई से कहा, ''भले ही यह खेल अब बल्लेबाजों का खेल बन गया है लेकिन फिर भी यॉर्कर इसका एक अहम हिस्सा बनी हुई है।''
भारत की 1983 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य ने कहा, ''यॉर्कर डालने के लिए आपको अपनी लाइन और लेंथ में बहुत अधिक निरंतरता रखनी पड़ती है। आपको बल्ले के निचले हिस्से पर गेंद मारनी होती है। अगर गेंद थोड़ी भी ऊपर लग जाए तो वह छक्का बन जाती है। वाइड यॉर्कर के मामले में भी यही बात लागू होती है। आपकी लेंथ ही सबसे अधिक मायने रखती है।''
उन्होंने कहा, ''इसके लिए आपको लगातार अभ्यास करते रहना पड़ता है। यॉर्कर और धीमी गेंदें इस खेल का एक बहुत ही जरूरी हिस्सा बनी हुई हैं।''
अन्य विशेषज्ञ भी मदनलाल की बात से सहमत हैं। आम राय यह है कि आईपीएल ने यॉर्कर को खत्म तो नहीं किया है लेकिन इसकी कमजोरियों को उजागर कर दिया है। थोड़ी सी भी चूक होने पर मिलने वाली सजा को बढ़ा दिया है और इसके सही इस्तेमाल को क्रिकेट के सबसे दुर्लभ कौशल वाले कामों में से एक बना दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जो बदलाव आया है, वह यह है कि टी20 क्रिकेट ने यॉर्कर को डेथ ओवरों के एक आम विकल्प से बदलकर एक ऐसी खास कला बना दिया है जिसके लिए असाधारण सटीकता की जरूरत होती है।
मुंबई इंडियन्स के लिए मलिंगा की पैर की अंगुलियों को कुचल देने वाली सटीक यॉर्कर से लेकर चेन्नई सुपरकिंग्स के लिए ड्वेन ब्रावो की धीमी यॉर्कर में विविधताएं, और जसप्रीत बुमराह की मशीन जैसी अचूक यॉर्कर, वर्षों तक आईपीएल में डेथ ओवरों की गेंदबाजी की पहचान यॉर्कर ही रही है।
भारत के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज और टीवी विश्लेषक दीप दासगुप्ता का मानना है कि सबसे बड़ा बदलाव आधुनिक बल्लेबाजों के मूवमेंट में आया है।
उन्होंने कहा, ''वह क्लासिक 'टो क्रशिंग' यॉर्कर जो वसीम (अकरम) और वकार (यूनिस) उस जमाने में फेंकते थे वह बल्लेबाजों के पंजों को निशाना बनाती थी। उस समय पंजे स्थिर लक्ष्य होते थे क्योंकि वनडे या टेस्ट मैच में बल्लेबाज अधिक मूव नहीं करते थे।''
दासगुप्ता ने कहा, ''लेकिन आजकल टी20 क्रिकेट के बदलते माहौल में बल्लेबाज क्रीज की पूरी गहराई का इस्तेमाल करते हैं। वह जमाना चला गया जब बल्लेबाजों के पंजे स्थिर रहते थे। अब अगर आप अचानक पारंपरिक यॉर्कर फेंकने का अभ्यास करते हैं और मान लीजिए कि बल्लेबाज क्रीज में काफी पीछे चला जाता है तो वह गेंद अब यॉर्कर नहीं बल्कि 'हाफ वॉली' बन जाती है।''
उन्होंने कहा, ''अगर बल्लेबाज क्रीज से एक फुट बाहर खड़ा होता है तो वही गेंद फुलटॉस बन सकती है। अब बल्लेबाज जगह बनाने के लिए अगल-बगल भी हटते हैं इसलिए उनके पंजे भी स्थिर नहीं रहते जिन्हें आप निशाना बनाकर पारंपरिक यॉर्कर फेंक सकें।''
यह बदलाव आईपीएल के रन बनाने के पैटर्न में भी दिखता है।
पिछले कुछ वर्षों में डेथ ओवरों में रन रेट लगातार बढ़ा है क्योंकि बल्लेबाजों ने 'फिनिशिंग' को एक कला बना दिया है। वे अपनी मूवमेंट और पहले से अनुमान लगाने की क्षमता का इस्तेमाल करके गेंदबाज की छोटी सी गलती को भी बाउंड्री में बदल देते हैं।
वर्ष 2008 में हुए पहले आईपीएल में डेथ ओवरों (17वें से 20वें ओवर तक) का औसत रन रेट 9.41 था जो धीरे-धीरे बढ़कर 2025 तक 11.5 हो गया। इसी तरह 2008 में टीमों का औसत स्कोर 157 था जो 2025 में बढ़कर 180 तक पहुंच गया है।
इसके अलावा 2023 में 'इम्पैक्ट प्लेयर' नियम की शुरुआत ने भी इस बात में अहम भूमिका निभाई है कि अब स्लॉग ओवरों में 'यॉर्कर' का इस्तेमाल कम किया जाने लगा है।
इस बेहद चर्चित नियम ने खेल का पलड़ा बल्लेबाजों की तरफ झुका दिया है क्योंकि अब कोई भी टीम मैच के दौरान किसी भी समय अपने एक खिलाड़ी को दूसरे खिलाड़ी से बदल सकती है। असल में इससे टीम का बल्लेबाजी क्रम और भी मजबूत हो जाता है।
भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज और चर्चित कोच डब्ल्यूवी रमन ने कहा कि यह रणनीतिक बदलाव पारंपरिक यॉर्कर की सख्त प्रकृति की वजह से आया है।
उन्होंने कहा, ''जब गेंदें 'टो-क्रशर' (पैर के अंगूठे को निशाना बनाने वाली) होती हैं तो गलती की गुंजाइश बहुत कम होती है। अगर लाइन या लेंथ थोड़ी भी इधर-उधर हुई तो गेंद को कहीं भी मारा जा सकता है। वाइड यॉर्कर में कम से कम आप एक तरफ कुछ सुरक्षा तो दे सकते हैं। और गति में बदलाव, ऑफ स्टंप के बाहर गेंद डालने से बल्लेबाजों के लिए मुश्किल पैदा होती है, कम से कम सैद्धांतिक तौर पर तो ऐसा ही है।''
मौजूदा सत्र में जब रिवर्स स्विंग बीच-बीच में देखने को मिल रही है तो मिचेल स्टार्क जैसे गेंदबाजों ने यह साबित कर दिया है कि अगर गेंद में मूवमेंट हो तो यॉर्कर को खेलना लगभग नामुमकिन होता है।
अंशुल कंबोज (चेन्नई सुपरकिंग्स), वैशाख विजयकुमार (पंजाब किंग्स) और कार्तिक त्यागी (कोलकाता नाइट राइडर्स) जैसे भारतीय गेंदबाजों को वाइड यॉर्कर गेंदबाजी में काफी सफलता मिली है।''
भारत के पूर्व स्पिनर और चयनकर्ता सरनदीप सिंह ने कहा, ''यॉर्कर अब भी सबसे बेहतरीन गेंद है, विशेषकर तब जब गेंद में रिवर्स स्विंग हो। लेकिन इसे सही तरीके से डालना जरूरी है। आजकल गेंदबाज वाइड यॉर्कर का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरा मानना है कि वाइड यॉर्कर में महारत हासिल करना सबसे मुश्किल काम है।''
भाषा सुधीर
सुधीर
0505 1723 नयी दिल्ली