मैंने दुनिया में कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं किया: झुम्पा लाहिड़ी
नेत्रपाल
- 31 Jan 2026, 07:46 PM
- Updated: 07:46 PM
नयी दिल्ली, 31 जनवरी (भाषा) झुम्पा लाहिड़ी की कहानियां और पात्र लगातार किसी ऐसी जगह की तलाश में रहते हैं जहां वे खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सकें लेकिन कभी भी पूरी तरह से घर जैसा महसूस नहीं कर पाते। वे विस्थापन की कठिनाइयों से जूझते हुए जीवित रहते हैं, फिर भी किसी भी जगह से संबंधित होने की खोज कभी उनकी प्राथमिकता नहीं रही।
इतालवी दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र में शुक्रवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में ब्रिटिश-अमेरिकी लेखिका ने उन विषयों पर विस्तार से बात की जो उनके जीवन और कहानियों के केंद्र में रहे हैं।
पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित लाहिड़ी का जन्म ब्रिटेन में बंगाली माता-पिता के घर हुआ था। वह अमेरिका में पली-बढ़ीं और अब रोम में रहती हैं। उनके लिए घर एक पुस्तकालय हो सकता है, सभी भाषाएं विदेशी हैं और प्रवासी होना उनके जीवन में हमेशा एक स्थायी अनुभव रहा है।
जीवनभर प्रवासी रहीं लाहिड़ी ने कहा कि प्रवासन को लेकर मौजूदा वैश्विक स्थिति ''भयानक और डरावनी'' है, लेकिन यह उनके लिए कोई नयी बात नहीं है।
'इंटरप्रेटर ऑफ मैलाडीज' की लेखिका ने कहा, ''एक प्रवासी होना मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। मैं हमेशा से ऐसा ही रही हूं.. इस समय (दुनिया में प्रवासन को लेकर) जो कुछ हो रहा है वह चिंताजनक, भयानक और डरावना है। ऐसा लगता है जैसे हम पीछे जा रहे हैं। लेकिन मेरे लिए कुछ भी नया नहीं है। मैंने दुनिया के किसी भी स्थान पर कभी भी पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं किया।''
लाहिड़ी (58) ने कहा कि उन्हें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि उनके परिवार को दुनिया में कहीं भी रहने का पूरा अधिकार है।
उन्होंने कहा, ''मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा है कि लोगों की निगाहें हम पर, मुझ पर, मेरे माता-पिता पर टिकी हुई हैं, वे हमें अजीब तरह से देख रहे हैं, सोच रहे हैं, सवाल कर रहे हैं कि हम वहां क्या कर रहे हैं। अमेरिका में, हमारी उपस्थिति को कभी-कभी विनम्रतापूर्वक और कभी-कभी उतनी विनम्रता से स्वीकार नहीं किया गया। इसलिए छोटी उम्र से ही मुझे यह एहसास था कि जिस समुदाय में हम रहते थे, वहां हमारा स्वागत तो किया जाता था, लेकिन हमें पूरी तरह से अपनाया नहीं जाता था।''
लेखिका की पहली पुस्तक, 'इंटरप्रेटर ऑफ मैलाडीज' को 1999 में आलोचकों से काफी सराहना मिली और इसे कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए, जिनमें पेन/हेमिंगवे पुरस्कार, द न्यू यॉर्कर का सर्वश्रेष्ठ डेब्यू पुरस्कार और फिक्शन के लिए पुलित्जर पुरस्कार शामिल हैं।
लेखिका ने कुछ मजबूत भाषाओं से गौण भाषाओं के लिए उत्पन्न होने वाले खतरे के प्रति भी चेतावनी दी और नए लेखकों को अन्य भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित किया।
भाषा
देवेंद्र नेत्रपाल
नेत्रपाल
3101 1946 दिल्ली