एक्सप्लेनर: उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने के लिए यूजीसी के विनियम क्या हैं
नरेश
- 27 Jan 2026, 08:27 PM
- Updated: 08:27 PM
नयी दिल्ली, 27 जनवरी (भाषा) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026 ने देश के कई स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन और आंदोलनों को जन्म दिया है। इन नए विनियमों का उद्देश्य वर्ष 2012 के भेदभाव-रोधी ढांचे को प्रतिस्थापित करना और इसे उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) में अनिवार्य रूप से लागू करना है।
देशभर में इन विनियमों के खिलाफ व्यापक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें सोशल मीडिया पर हो रहे विरोध भी शामिल हैं।
हाल ही में अधिसूचित यूजीसी के इन विनियमों को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन विनियमों में जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है।
वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को आश्वासन दिया कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।
उन्होंने कहा, ''मैं विनम्रतापूर्वक सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी को भी किसी प्रकार के उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा, कोई भेदभाव नहीं होगा और किसी को भी भेदभाव के नाम पर इस नियम का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं होगा।''
प्रधान ने यह बयान राजस्थान के डीडवाना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया।
नए विनियमों से जुड़ा एक व्याख्यात्मक विवरण:
अधिकारियों के अनुसार, सरकार ने 13 जनवरी को नए विनियम अधिसूचित किए जिनके तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समता को बढ़ावा देने के वास्ते 'समता समितियों' का गठन अनिवार्य किया गया है।
यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग जन (पीडब्ल्यूडी) और महिलाएं शामिल हों।
इन विनियमों का एक प्रारूप पिछले वर्ष फरवरी में जनता से सुझाव और प्रतिक्रियाएं प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक किया गया था।
यह दस्तावेज़ उस समय जारी किया गया था जब उच्चतम न्यायालय ने 2012 के यूजीसी विनियमों के क्रियान्वयन पर सवाल उठाने संबंधी रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर याचिका की सुनवाई की। इस दौरान यूजीसी को नए विनियम प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था।
विनियमों में निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार, इसका लक्ष्य ''धर्म, नस्ल, लैंगिग आधार पर, जन्म स्थान, जाति या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों या इनमें से किसी के भी विरुद्ध होने वाले भेदभाव को खत्म करना, तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के सभी हितधारकों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को बढ़ावा देना है।
यह विनियम यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2012 का स्थान लेता है, जो मुख्यतः परामर्शात्मक (एडवाइजरी) प्रकृति के थे। इसके विपरीत, नया विनियम अनिवार्य और बाध्यकारी है तथा इसके तहत केंद्र और समिति की स्थापना, भेदभाव न हो यह सुनिश्चित करने के लिए हेल्पलाइन की व्यवस्था, और इसके साथ-साथ एक समग्र निगरानी तंत्र प्रदान किया गया है।
नए विनियम का विरोध हो रहा है मुख्यतः सामान्य या अनारक्षित वर्गों द्वारा और उनका तर्क है कि ये विनियम उनके प्रति भेदभावपूर्ण हो सकते हैं।
इस विनियम को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इसने जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है।
याचिका में कहा गया कि हाल ही में अधिसूचित यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 का विनियम 3(ग) "गैर-समावेशी" है और यह उन छात्रों और शिक्षकों की रक्षा करने में विफल है, जो आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते।
इस बीच, आलोचकों ने कहा है कि इस विनियम में दुरुपयोग वाली शिकायतों से सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है और भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट बनी हुई है। इसके अलावा समता समितियों में 'सामान्य' वर्ग का प्रतिनिधित्व अनिवार्य न होने की व्यवस्था की भी आलोचना की गई है।
भाषा शोभना नरेश
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