आरटीआई के तहत जानकारी देने में सरकार अनिच्छुक : राज्यसभा में तृणमूल सांसद का आरोप
मनीषा माधव
- 10 Dec 2025, 04:28 PM
- Updated: 04:28 PM
नयी दिल्ली, 10 दिसम्बर (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के सदस्य मोहम्मद नदीमुल हक ने बुधवार को राज्यसभा में आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत जानकारी देने को लेकर ‘‘अनिच्छुक और भयभीत’’ है। उन्होंने मांग की कि इस कानून की पवित्रता को बनाए रखा जाए।
शून्यकाल में यह मुद्दा उठाते हुए हक ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत सूचना पाने का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसके बावजूद यह सरकार आरटीआई कानून 2005 को कमजोर कर रही है। जब यह कानून लागू हुआ था, तब भारत का आरटीआई कानून कई देशों के समान कानूनों से कहीं आगे था। हम एकमात्र ऐसा देश थे, जहां 30 दिनों के भीतर सूचना देने की समय-सीमा तय थी।’’
उन्होंने दुख व्यक्त किया कि 20 साल बाद राजग सरकार ने आरटीआई का मजाक बना दिया है। उन्होंने एनडीए सरकार को तंज करते हुए ‘‘नो डेटा अवेलेबल’’ सरकार कहा।
उन्होंने कहा कि नवंबर 2025 तक केंद्रीय सूचना आयोग में 10 में से 8 पद रिक्त हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पांच सितंबर से देश में मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) तक नहीं है जिसके कारण लंबित दूसरी अपीलों के निपटारे में दो से तीन वर्ष तक लग जाते हैं, और तब तक सूचना का कोई वास्तविक महत्व नहीं रह जाता।
उन्होंने कहा, ‘‘यह सरकार डिजिटल इंडिया की बात तो करती है, लेकिन वास्तविकता में आरटीआई की वेबसाइट एक दुःस्वप्न जैसी है। पिछले सात महीनों से आरटीआई कार्यकर्ता वेबसाइट क्रैश होने और ओटीपी में देरी की शिकायत कर रहे हैं। इन समस्याओं को दुरुस्त न करके सरकार यह दिखा रही है कि वह जानकारी देने को लेकर कितनी अनिच्छुक और भयभीत है।’’
हक ने यह भी कहा कि इसी तरह की शिकायत वक्फ उम्मीद पोर्टल के साथ भी हुई, जिसमें कई तकनीकी खामियां थीं, लेकिन सरकार ने न तो उन्हें दूर किया और न ही समय-सीमा बढ़ाई।
उन्होंने कहा कि भारत के लोग जानकारी चाहते हैं, जो उनका अधिकार है। उन्होंने कहा कि बंगाल के लोग यह जानने के हकदार हैं कि न्यायालय के आदेश के बावजूद मनरेगा की 52,000 करोड़ रुपये की लंबित देनदारियां केंद्र सरकार ने अब तक क्यों जारी नहीं कीं।
हक ने कहा, ‘‘हम यह जानने के भी हकदार हैं कि विभिन्न योजनाओं के तहत दो लाख करोड़ रुपये की लंबित देनदारियां केंद्र सरकार कब जारी करेगी। हमने देखा है कि यह सरकार संसद में जवाबदेही से कैसे बचती है।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि आरटीआई कानून को कमजोर करके मोदी सरकार जनता के प्रति जवाबदेही से बच रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘अंत में, मैं सरकार से बस यही आग्रह कर सकता हूं कि रिक्तियां भरी जाएं, क्षमता बहाल की जाए और इस कानून व भारतीय लोकतंत्र की पवित्रता की रक्षा की जाए। अन्यथा, आरटीआई कानून कागजों पर भले रहे, लेकिन व्यवहार में पारदर्शिता ढह जाती है और इसकी पूरी जिम्मेदारी इसी सरकार की होगी।’’
भाषा मनीषा