कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आदिवासी संगठन के प्रस्तावित आंदोलन पर लगाई रोक
योगेश दिलीप
- 17 Dec 2024, 06:33 PM
- Updated: 06:33 PM
कोलकाता, 17 दिसंबर (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल किए जाने की मांग को लेकर एक आदिवासी संगठन के राष्ट्रीय राजमार्गों या रेलवे पटरियों को अवरुद्ध करने पर मंगलवार को रोक लगा दी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह मामला बड़े समुदाय से जुड़ा हुआ है, इसलिए सरकार के लिए उचित होगा कि वह इन लोगों की मांगों पर विचार करे। अदालत ने कहा कि यदि संभव हो तो सरकार संगठन के सदस्यों को चर्चा के लिये बुला सकती है, ताकि यह मुद्दा सुलझाया जा सके।
मुख्य न्यायाधीश टी एस शिवज्ञानम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने संगठन के सदस्यों को राष्ट्रीय राजमार्गों या रेलवे पटरियों को अवरुद्ध करने वाले किसी भी आंदोलन को नहीं करने का निर्देश दिया।
संगठन ने 20 दिसंबर को सुबह छह बजे से राष्ट्रीय राजमार्गों या रेल पटरियों को अवरूद्ध करने का आह्वान किया था।
पीठ ने निर्देश दिया कि यदि इस आदेश का कोई उल्लंघन होता है, तो राज्य सरकार निर्देशों की अवहेलना करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
इस पीठ में न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य भी शामिल थे।
अदालत के समक्ष दायर एक जनहित याचिका में कहा गया है कि 'भारत जकात माझी परगना महल' नामक एक अपंजीकृत संगठन ने अपने समुदाय को अनुसूचित जनजाति आरक्षित श्रेणी में शामिल करने, संथाली माध्यम शिक्षा बोर्ड के गठन और अन्य संबंधित मुद्दों को लेकर आंदोलन की योजना बनाई है।
आंदोलन का आह्वान करने वाले प्रतिवादियों के वकील ने अदालत के समक्ष पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को मांगों के साथ 30 अक्टूबर को दिए गए अपने ज्ञापन की एक प्रति पेश की।
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि यदि 15 दिसंबर तक उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू कर देंगे, जिसमें हजारों आदिवासी लोग शामिल होंगे।
राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकारियों को दिए गए एक अन्य ज्ञापन में उन्होंने 20 दिसंबर से राष्ट्रीय राजमार्ग 16 को अनिश्चितकाल के लिए अवरुद्ध करने की भी बात कही थी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि ये मांगें मूलतः नीतिगत मामले हैं और इनमें संविधान में किसी समुदाय को आरक्षित श्रेणी में शामिल करने से संबंधित मामले भी शामिल हैं।
पीठ ने कहा कि अदालत सरकार को किसी विशेष तरीके से नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।
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