कर्नाटक को प्रगतिशील होने के लिए दंडित न करें: सिद्धरमैया ने केंद्र सरकार से कहा
प्रीति रंजन
- 01 Nov 2024, 03:41 PM
- Updated: 03:41 PM
बेंगलुरु, एक नवंबर (भाषा) कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने शुक्रवार को करों के हस्तांतरण में न्याय की जरुरत पर जोर दिया।
मुख्यमंत्री ने कटाक्ष करते हुए कहा कि किसी को भी दुधारू गाय का पूरा दूध नहीं निकालना चाहिए, अन्यथा बछड़ा कुपोषित हो जाएगा।
कर्नाटक के 69वें स्थापना दिवस के अवसर पर बेंगलुरु के श्री कांतीरवा स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए सिद्धरमैया ने कहा कि कर्नाटक के साथ अन्याय हो रहा है।
उन्होंने बताया कि राज्य केंद्र सरकार को चार लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व दे रहा है और महाराष्ट्र के बाद राजस्व देने वाला दूसरा सबसे बड़ा राज्य देश में कर्नाटक ही है।
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘हम चार लाख करोड़ से ज़्यादा राजस्व देते हैं, लेकिन हमें सिर्फ़ 55,000 करोड़ से 60,000 करोड़ ही मिल रहे हैं। कन्नड़ लोगों को यह बात पता होनी चाहिए। हमें अपने योगदान का सिर्फ़ 14 से 15 प्रतिशत ही मिल रहा है।’’
उन्होंने कहा कि संघीय व्यवस्था के तहत सिर्फ इसलिए कोई अन्याय नहीं होना चाहिए क्योंकि कर्नाटक एक प्रगतिशील राज्य है।
सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘सिर्फ इसलिए कि एक दुधारू गाय दूध दे रही है, हमें उसका पूरा दूध नहीं निकालना चाहिए। हमें बछड़े के लिए भी थोड़ा दूध छोड़ना चाहिए, नहीं तो वह कुपोषित हो जाएगा। यह बात किसी को कभी नहीं भूलनी चाहिए।’’
मुख्यमंत्री ने कन्नड़ भाषा पर गर्व करने और संभंव हो तो इसे रोजाना इस्तेमाल में लाने पर जोर दिया।
सिद्धरमैया ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों से कहा कि कर्नाटक में 200 से ज़्यादा भाषाएं बोलने वाले लोग हैं। उन्होंने कहा कि यहां के लोग चाहे जो भी भाषा बोलते हों या फिर वे किसी भी जाति या धर्म से हों, वे सभी कन्नड़ हैं। मुख्यमंत्री ने लोगों से कहा कि जो लोग हवा, पानी और भोजन का सेवन करते हैं, वे कन्नड़ हैं।
उन्होंने कहा कि कन्नड़ बहुत पुरानी भाषा है जिसका इतिहास 7,000 साल पुराना है। इसलिए केंद्र ने भी इसे शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी है।
सिद्धरमैया ने लोगों से अपील की कि उन्हें कभी भी कन्नड़ भाषा का त्याग नहीं करना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘मैं उदार होने का विरोध नहीं करता। मैं वास्तव में उदार होने का समर्थन करता हूं, लेकिन अपनी भाषा की बलि चढ़ाकर नहीं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमारी भाषा के प्रति हमारा लगाव अत्यधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन हमें अपनी भाषा के प्रति गर्व कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हम सभी को कन्नड़ प्रेमी होना चाहिए।’’
भाषा प्रीति