उपद्रव फैलाने वाले व्यवहार को बढ़ावा देना दुर्भाग्यपूर्ण, इसे स्वीकार्य मानदंड नहीं बनायें: अदालत
धीरज माधव
- 27 Aug 2024, 06:27 PM
- Updated: 06:27 PM
मुंबई, 27 अगस्त (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन दिनों अव्यवस्था एवं उपद्रव फैलाने वाले व्यवहार को प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा अब यह संदेश देने का समय आ गया है कि ऐसे व्यवहार को स्वीकार्य मानदंड नहीं बनने दिया जा सकता।
अदालत ने इसी के साथ शहर के एक महाविद्यालय द्वारा दुर्व्यवहार के आधार पर पुस्तकालय सहायक को बर्खास्त करने के फैसले को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति आर.एम.जोशी की एकल पीठ ने इसी के साथ मल्लीनाथ विट्ठल वथाकर की याचिका खारिज कर दी जिसने मुंबई के उप नगर चेम्बूर स्थित नारायण गुरु कॉलेज ऑफ कामर्स द्वारा उदण्ड और अवज्ञाकारी व्यवहार की शिकायत के बाद उसे बर्खास्त करने के फैसले को चुनौती दी थी।
अदालत ने 13 अगस्त को याचिका को खारिज कर दिया।
वथाकर ने सितंबर 2008 में मुंबई विश्वविद्यालय और कॉलेज न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें सेवा से हटाने के कॉलेज के फैसले के खिलाफ उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने 1996 में कॉलेज में नौकरी करनी शुरू की। उसे पहले चौकीदार के पद पर और बाद में पुस्तकालय सहायक के पद पर तैनात किया गया। वथाकर को 2008 में अपने सहकर्मियों के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार करने, प्राध्यापकों के साथ गाली-गलौज करने और एक प्राध्यापक को व्याख्यान देने से रोकने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि वथाकर के खिलाफ जांच प्रक्रिया पारदर्शी और उचित तरीके से की गई और उसे अपनी बात रखने का उचित मौका दिया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘शैक्षणिक संस्थान वह स्थान होता है जहां पर अनुशासन के उच्च मानक की उम्मीद की जाती है ताकि विद्यार्थियों के लिए उदाहरण पेश किया जा सके। इसी प्रकार किसी भी शिक्षण संस्थान की ख्याति के लिए ऐसे अनुशासन को बनाए रखना निश्चित तौर पर जरूरी है।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी भी कर्मचारी का इस तरह का दुर्व्यवहार किसी संस्थान में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता खासतौर पर शैक्षणिक संस्थान में।
अदालत ने टिप्पणी की, ‘‘दुर्भाग्य से आजकल अव्यवस्था और उपद्रव (फैलाने) वाले व्यवहार को प्रोत्साहन मिल रहा है। अब समय आ गया है कि समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया जाए कि इस तरह के असभ्य, अनियंत्रित और हिंसक व्यवहार को स्वीकार्य मानदंड बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
भाषा धीरज