चारों धाम के नाम का दुरूपयोग रोकने के लिए कानून बनाने के फैसले का संतों ने किया स्वागत
सं दीप्ति आशीष
- 19 Jul 2024, 10:19 PM
- Updated: 10:19 PM
हरिद्वार, 19 जुलाई (भाषा) उत्तराखंड मंत्रिमंडल द्वारा केदारनाथ, बदरीनाथ समेत प्रदेश में स्थित चारों धाम के नाम का दुरुपयोग रोकने के लिए कड़ा कानून बनाए जाने के निर्णय का संत समाज ने स्वागत किया है।
कनखल स्थित श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी की छावनी में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्रपुरी की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद संतों ने हरिद्वार के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को एक ज्ञापन सौंपकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को धन्यवाद दिया।
ज्ञापन देने के बाद संत बाबा हठयोगी ने कहा कि सनातन हिंदू धर्म के चार धाम, बारह ज्योतिर्लिंग और 52 शक्तिपीठों का कोई विकल्प नहीं हो सकता, इसलिए उनके नाम से कोई अन्य मंदिर या ट्रस्ट नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘धार्मिक स्थलों और संस्थाओं के नाम भारतवर्ष की सांस्कृतिक संपदा है जिनका सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उत्तराखंड मंत्रिमंडल के इस निर्णय से सांस्कृतिक पहचान और अधिकार को संरक्षित करने में सहायता मिलेगी।’’
संत विष्णु दास महाराज ने कहा कि पिछले काफी समय से कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा उत्तराखंड में स्थित चार धाम के नाम का प्रयोग कर ट्रस्ट, समिति व अन्य संस्थान बनाए जा रहे थे जिससे जन सामान्य में भ्रम और आक्रोश की आशंका पैदा हो रही। उन्होंने कहा कि मंत्रिमडल के इस निर्णय से चारधाम जैसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों की संस्कृति संपदा को स्पष्ट एवं आवश्यक विधिक सुरक्षा मिलेगी।
युवा भारत साधु समाज के महामंत्री स्वामी रवि देव शास्त्री एवं महंत सूर्यमोहन गिरी ने कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, भारत की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में सहयोग करने वाले इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करती है और मुख्यमंत्री धामी का धन्यवाद देती है।
उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद का एक प्रतिनिधिमंडल इस संबंध में जल्द मुख्यमंत्री से भेंट करेगा और संत समाज की ओर से उनका स्वागत करेगा।
दिल्ली में केदारनाथ मंदिर की प्रतिकृति के प्रस्तावित निर्माण को लेकर उठे विवाद के बीच राज्य मंत्रिमंडल ने बृहस्पतिवार को बदरीनाथ और केदारनाथ समेत प्रदेश में स्थित चार धाम तथा उनके संचालन के लिए गठित समिति के नाम से मिलते-जुलते नामों का प्रयोग रोकने के लिए कड़े विधिक प्रावधान लागू करने का निर्णय किया।
भाषा सं दीप्ति