हिंदी सिनेमा में किरदारों ने अपनी अलग पहचान खो दी है: अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा
संतोष
- 09 Aug 2026, 04:07 PM
- Updated: 04:07 PM
(किशोर द्विवेदी)
लखनऊ, नौ अगस्त (भाषा) प्रसिद्ध अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा का मानना है कि पहले हिंदी सिनेमा और टेलीविजन जगत के यादगार किरदारों की लोकप्रियता लंबे समय तक कायम रहती थी, लेकिन अब किरदारों को ऐसी लोकप्रियता मिलने में कमी आई है क्योंकि आजकल की फिल्में परदे पर अलग तरह के किरदार नहीं उतार रहीं और ज्यादातर भूमिकाएं एक जैसी लगने लगी हैं।
'चंद्रकांता' में क्रूर सिंह, 'सरफरोश' में मिर्ची सेठ और 'गंगाजल' में डीएसपी भूरेलाल जैसी यादगार भूमिकाओं के लिए प्रख्यात मिश्र ने कहा कि 'पर्दे पर दिखने की अवधि' के बजाय मजबूत किरदार ही वे चीज है जिसकी वजह से सहायक भूमिकाएं भी लोगों की यादों में बस जाया करती थीं।
लखनऊ यात्रा पर आए अभिनेता ने 'पीटीआई-भाषा' को दिए एक साक्षात्कार में कहा, "पहले लोग किरदारों से जुड़ते थे। आज फिल्मों में किरदारों को ठीक से नहीं दिखाया जाता। हर कोई एक जैसा अभिनय करता है और एक ही लहजे में बात करता है। इस प्रक्रिया में किरदारों का रंग रूप और पहचान खो गई है। जब दर्शक किसी किरदार से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते तो आखिरकार फिल्मों को नुकसान होता है।"
मिश्रा ने आमिर खान की ऑस्कर के लिए नामित फिल्म लगान में अर्जन का भी किरदार निभाया था जो इस साल अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रही है।
उन्होंने एक उदाहरण के जरिए इसे समझाया। मिश्रा ने कहा, "जब आप इंद्रधनुष देखते हैं तो आप दूसरों को भी इसे देखने के लिए बुलाते हैं क्योंकि इसमें सातों रंग दिखाई देते हैं। इसी तरह, कहानियां, प्रस्तुतियां, संगीत, भावनाओं और प्रस्तुतीकरण के लिए अलग-अलग रंगों की जरूरत होती है।"
उनसे पूछा गया कि पुराने दशकों के किरदारों को आज भी क्यों याद किया जाता है, जबकि आजकल के कई किरदार जल्द भुला दिए जाते हैं तो मिश्रा ने कहा, "अब यादगार किरदार नहीं लिखे जा रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "गब्बर सिंह, मोगैम्बो या सखाराम जैसे किरदार कहां हैं। क्रूर सिंह, मिर्ची सेठ या डीएसपी भूरेलाल जैसे किरदार कहां लिखे जा रहे हैं। पुलिस की फिल्में अब भी बनाई जा रही हैं, लेकिन आपको इस तरह के यादगार किरदार नहीं मिलेंगे।"
मिश्रा ने कहा कि पहले फिल्म निर्माता खास तरह के किरदारों के लिए रंगमंच के कलाकारों को सक्रिय रूप से चुनते थे। उन्होंने उदाहरण के तौर पर अमजद खान और अमरीश पुरी जैसे कलाकारों का जिक्र किया।
उन्होंने याद दिलाया, "वे ऐसे कलाकार तलाशते थे जो ये किरदार बन सकें। मुझे मेरे रंगमंच के कार्य की वजह से क्रूर सिंह के किरदार के लिए चुना गया। जॉन मैथ्यू मैथन ने मेरा एक नाटक देखने के बाद मुझे सरफरोश के लिए चुना।"
हालांकि उन्होंने यह बात स्वीकार की कि इस उद्योग की कार्य संस्कृति अधिक संगठित हो गई है। फिल्म उद्योग पूरी तरह से बदल गया है। नए लोग आए हैं और कार्यशैली अधिक आधुनिक एवं कॉरपोरेट जगत जैसी हो गई है। एक सकारात्मक परिवर्तन यह है कि काम व्यवस्थित हो गया है और परियोजनाएं समय पर पूरा होती हैं चाहे वे फिल्में हों या वेब सीरीज, लेकिन पहले ऐसा नहीं था।
अभिनेता ने कहा, "सिनेमा की आत्मा इसकी कहानियों और किरदारों में बसती है। फिल्मों से भाषाएं गायब हो गई हैं और अभिनेताओं में संवाद बोलने की पश्चिमी किस्म की एक खास शैली की नकल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। निर्देशक भी यही चाहते हैं। इसके परिणाम स्वरूप, किरदार अपनी अलग पहचान खो देते हैं।"
उन्होंने कहा कि ओटीटी मंच अभिनेताओं के लिए एक बेहतर जगह के तौर पर उभरे हैं क्योंकि ये अधिक परिभाषित किरदारों की पेशकश करते हैं और प्रयोग करने को बढ़ावा देते हैं।
भाषा किशोर राजेंद्र
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