विशेषज्ञों ने भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते को औपनिवेशिक अतीत से जोड़ा
नेत्रपाल
- 18 Jul 2026, 04:38 PM
- Updated: 04:38 PM
नयी दिल्ली, 18 जुलाई (भाषा) विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंधों को दोनों देशों के साझा औपनिवेशिक इतिहास के नजरिये से देखा जाना चाहिए। उन्होंने साथ ही ब्रिटिश शासन की विरासत पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा की भी जरूरत बताई।
'व्यापार की शर्तें: भारत, ब्रिटेन और साम्राज्य की लंबी छाया' शीर्षक से यह चर्चा शुक्रवार को 'इंडिया हैबिटेट सेंटर' में आयोजित की गई थी। यह चर्चा भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीईटीए) के 15 जुलाई को लागू होने के बाद हुई।
प्रतिभागियों ने तर्क दिया कि भारत के ब्रिटेन के साथ संबंधों को केवल व्यापार और कूटनीति के नजरिये से नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक ''अनुभव आज भी आर्थिक नीतियों, संस्थानों और लोगों की स्मृति से जुड़ी बहसों को प्रभावित करता है।''
इतिहासकार प्रभु महापात्रा ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि ''मुक्त व्यापार व्यवस्था हमेशा समान और न्यायसंगत परिणाम नहीं देती''।
उन्होंने कहा, ''वास्तव में हमारे पास 1833 से एक मुक्त व्यापार समझौता, जिसे तथाकथित मुक्त व्यापार व्यवस्था कहा जाता है, मौजूद था। उस दौर में भारत का सबसे ज्यादा शोषण हुआ। भारत में आयात शुल्क (टैरिफ) 2.5 से 5 प्रतिशत तक था, जबकि दुनिया के बाकी देशों को 10 प्रतिशत शुल्क देना पड़ता था। वहीं, इंग्लैंड में आमतौर पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाता था।''
अर्थशास्त्री चरण सिंह ने भी भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते की आलोचना की और इसकी तुलना ब्रिटेन के भारत के साथ ऐतिहासिक व्यापारिक संबंधों से की।
सिंह ने कहा, ''जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई, तब विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारत की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत थी। जब वे भारत से गए, तब यह घटकर एक प्रतिशत रह गई थी। आज हम वैश्विक जीडीपी में लगभग चार प्रतिशत का योगदान देते हैं।''
उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की औसत प्रति व्यक्ति आय भारत से काफी ज्यादा है। उन्होंने तर्क दिया कि यह व्यापार समझौता ''ब्रिटेन को अपनी शर्तों के अनुसार व्यापार नियम तय करने की अधिक शक्ति दे सकता है। इससे भारत के पास सीमित विकल्प बचेंगे और उसे ऐसी शर्तें माननी पड़ सकती हैं, जिनसे मुख्य रूप से ब्रिटेन को लाभ हो।''
अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति विशेषज्ञ अभिजीत दास ने कहा कि आज व्यापार वार्ताएं केवल वस्तुओं और सेवाओं तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि डाटा प्रबंधन जैसे रणनीतिक मुद्दे भी इनके दायरे में शामिल हो गए हैं।
उन्होंने कहा, ''आज किसी व्यापार समझौते का दायरा केवल भौतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि डाटा तक भी विस्तारित हो गया है। भारत डाटा का एक विशाल स्रोत है और ऐसे समझौतों के तहत भारतीय डाटा तक बिना किसी प्रतिबंध के पहुंच भारत की आर्थिक संप्रभुता और रणनीतिक हितों पर लंबे समय में गंभीर प्रभाव डाल सकती है।''
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने वार्ताओं में पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, ''सरकार ने संधि के तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया है। ऐसे समझौतों पर संसद में चर्चा होनी चाहिए और उन्हें मंजूरी दी जानी चाहिए, क्योंकि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी ओर से कौन-सी प्रतिबद्धताएं की जा रही हैं।''
गोंसाल्वेस ने कहा कि कई देशों में ऐसे व्यापार समझौतों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चर्चा के लिए संसद के समक्ष रखा जाता है।
भाषा
देवेंद्र नेत्रपाल
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