जनकपुरी के स्कूल में बच्ची से दुष्कर्म: अदालत ने महिला शिक्षिका की जमानत रद्द की
सुरेश
- 15 Jul 2026, 07:16 PM
- Updated: 07:16 PM
नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी के जनकपुरी इलाके के एक निजी स्कूल में तीन साल की बच्ची से कथित दुष्कर्म के मामले में एक महिला शिक्षिका को दी गई जमानत बुधवार को रद्द कर दी और उसे तीन दिन के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत दर्ज इस मामले के मुख्य आरोपी, स्कूल के 'केयरटेकर' को दी गई जमानत भी 29 जून को रद्द कर दी थी और उसे एक जुलाई को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने बुधवार को कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत पर विचार करते समय पीड़िता को पहुंची शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक क्षति जैसे ''महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य पहलुओं'' को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस की उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें शिक्षिका को जमानत देने के निचली अदालत के 20 मई के आदेश को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने कहा कि प्रतिवादी को तीन दिन के भीतर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (पॉक्सो अदालत) के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है।
शिक्षिका को कथित तौर पर घटना की जानकारी अधिकारियों से छिपाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और निचली अदालत ने 14 मई को उसे एक दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत ने केवल इस आधार पर शिक्षिका को जमानत देकर गलती की कि पीड़िता ने शिकायत में उसका नाम नहीं बताया था।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने कहा कि तीन वर्ष की बच्ची से प्रारंभिक शिकायत के समय घटना का हर विवरण बताने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने इस महत्वपूर्ण तथ्य की पूरी तरह अनदेखी की कि पीड़िता ने न केवल अपनी मां की मौजूदगी में शिक्षिका की पहचान की थी, बल्कि घटनास्थल की भी पहचान की थी।
अदालत ने कहा, ''हैरानी की बात यह है कि ऐसा करने पर कोई कानूनी रोक नहीं होने के बावजूद, निचली अदालत ने प्रतिवादी की गिरफ्तारी के महज छह दिन के भीतर उसे नियमित जमानत दे दी। जबकि संबंधित आदेश के सामान्य अवलोकन से भी ऐसा कोई कारण सामने नहीं आता, जिससे यह स्पष्ट हो कि निचली अदालत ने ऐसा क्यों किया।''
अदालत ने कहा कि शिक्षिका पिछले 13 वर्षों से स्कूल में कार्यरत है और वहां एक महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली पद पर हैं। ऐसे में, विशेषकर जब मामले की कार्यवाही शुरुआती चरण में है, उसके द्वारा साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से बनाया गया एक विशेष कानून है। इसलिए, इसके तहत दर्ज मामलों में, विशेषकर आरोपी को जमानत देने पर विचार करते समय, अत्यधिक सावधानी, गंभीरता और सतर्कता बरती जानी चाहिए।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने दलील दी कि निचली अदालत ने शिक्षिका को जमानत देते समय अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता पर विचार नहीं किया तथा यांत्रिक ढंग से जमानत दे दी।
वहीं, शिक्षिका के वकील ने दलील दी कि वह पिछले 13 वर्षों से स्कूल में पढ़ा रही है और उसे इस मामले में ''झूठा फंसाया गया है।''
यह घटना एक मई को उस वक्त सामने आई, जब बच्ची की मां ने जनकपुरी थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूल में 'केयरटेकर' ने उनकी बेटी का यौन उत्पीड़न किया।
शिकायत के अनुसार, बच्ची दाखिले के दूसरे दिन यानी 30 अप्रैल को स्कूल गई थी। घर लौटने के बाद उसने दर्द की शिकायत की। मां के पूछने पर बच्ची ने घटना की जानकारी दी।
बच्ची की मां की शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 64(1) (दुष्कर्म के लिए सजा) और पॉक्सो अधिनियम की धारा-छह (यौन हमले के लिए सजा) के तहत मामला दर्ज किया।
पुलिस ने बताया कि बच्ची ने आरोपी की पहचान कर ली, जिसके बाद स्कूल के 'केयरटेकर' को एक मई को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
हालांकि, अभियोजन पक्ष के कड़े विरोध के बावजूद द्वारका की एक अदालत ने सात मई को उसे जमानत दे दी थी।
भाषा आशीष सुरेश
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