खाली बर्थ सब्जियों की तरह बेचते हैं टीटीई, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे रेलवे: उच्च न्यायालय
सुरेश
- 13 Jul 2026, 03:50 PM
- Updated: 03:50 PM
(अमिताव रॉय)
कोलकाता, 13 जुलाई (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ 'यात्रा टिकट परीक्षक' (टीटीई) रेलगाड़ियों में खाली बर्थ को ''बाजार में सब्जियों की तरह बेचते हैं।'' अदालत ने देश के सभी रेलवे मंडलों के महाप्रबंधकों को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में दोषी टीटीई के खिलाफ उपलब्ध अधिकतम दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी ही एक घटना के कारण मादक पदार्थ देकर दो यात्रियों से लूटपाट की गयी और मादक पदार्थ के कारण ही उनमें से एक यात्री की मौत हो गयी।
अदालत ने कहा कि फरवरी 2009 में न्यू जलपाईगुड़ी से सियालदह जा रही तीस्ता-तोरसा एक्सप्रेस में दो व्यक्ति अनारक्षित टिकट लेकर सवार हुए थे। उन्होंने टीटीई को रिश्वत देकर बर्थ हासिल की। बाद में दो अपराधियों ने उनके कीमती सामान लूटने के इरादे से उन्हें नशीला पदार्थ दे दिया।
इनमें से एक यात्री की उसे दिए गए नशीले पदार्थ के कारण मौत हो गयी। उसे पहले से अन्य गंभीर बीमारियां थीं।
न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति बिस्वरूप चौधरी की खंडपीठ ने कहा, ''यह अदालत इस फैसले की प्रति पूर्वी रेलवे सहित देश के सभी रेलवे मंडलों के महाप्रबंधकों को भेज रही है, ताकि ट्रेन की खाली बर्थ को बाजार में सब्जियों की तरह बेचने वाले टीटीई के खिलाफ उपलब्ध अधिकतम दंड सुनिश्चित किया जा सके।''
अदालत ने कहा कि टीटीई के इस आचरण के कारण एक ऐसे यात्री की जान चली गई, जिससे केवल लूटपाट की गयी थी। खंडपीठ ने कहा, ''ऐसे कई मामले हैं, जिनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती, लेकिन उनमें मामूली चोरी के शिकार लोगों को गंभीर चिकित्सकीय परिणाम भुगतने पड़ते हैं।''
खंडपीठ ने पिछले सप्ताह दिए आदेश में कहा कि ऐसे अपराधों के लिए टीटीई की भूमिका ही मूल कारण बनती है।
अदालत ने जांच और अभियोजन में कई गंभीर खामियों को लेकर पुलिस की भी कड़ी आलोचना की।
इस मामले में आलोक घोष और गोपाल मिस्त्री को निचली अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या, धारा 328 के तहत जहर या नशीला पदार्थ देकर नुकसान पहुंचाने, चोरी करने तथा जीवित बचे यात्री की हत्या के प्रयास के आरोप में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास तथा अन्य सजाएं सुनाई थीं। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि घोष और मिस्त्री क्रमशः 10 और 16 वर्ष जेल में बिताने के बाद फिलहाल जमानत पर हैं।
आलोक घोष और गोपाल मिस्त्री को 10 जुलाई 2017 को दोषी ठहराया गया था और अगले दिन सियालदह सत्र अदालत ने उन्हें सजा सुनाई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि इस मामले की जांच अपर्याप्त रही। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने मृतक की विसरा की फॉरेंसिक रिपोर्ट तक प्राप्त नहीं की।
अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि विसरा को फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेजा गया था। अदालत ने कहा, ''जांच अधिकारी की यह चूक किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है।''
खंडपीठ ने कहा कि न्यू जलपाईगुड़ी से सियालदह जा रही तीस्ता-तोरसा एक्सप्रेस में बिना पूर्व आरक्षण के दो यात्रियों को बर्थ आवंटित करने वाले टीटीई तथा यात्रा के दौरान सियालदह तक ड्यूटी पर रहे अन्य टीटीई की गंभीर लापरवाही अत्यंत चिंताजनक है।
अदालत ने कहा, ''टीटीई अक्सर यात्रियों के अनुरोध पर पैसे लेकर उन्हें बर्थ आवंटित कर देते हैं।''
खंडपीठ ने कहा कि इस अपराध के घटित होने की मुख्य वजह भारतीय रेलवे के टीटीई की लापरवाही रही।
अदालत ने बताया कि फरवरी 2009 में अरुण चक्रवर्ती और सुनील कुमार दास अनारक्षित टिकट लेकर यात्रा कर रहे थे। अपनी पुरानी आदत के अनुसार उन्होंने संबंधित टीटीई को रिश्वत देकर बर्थ हासिल कर ली।
यात्रा के दौरान दोनों को नशीला पदार्थ देकर उनके कीमती सामान लूट लिये गए। अरुण चक्रवर्ती नौ दिन अस्पताल में भर्ती रहने के बाद बच गए, जबकि सुनील कुमार दास की मौत हो गई।
अदालत में एक वकील ने दलील दी कि रिश्वत देकर बिना आरक्षण ट्रेन में बर्थ हासिल करने वाले यात्रियों की पहचान कर पाना संभव नहीं होता।
उन्होंने कहा कि ऐसे यात्री नियमित आरक्षण प्रक्रिया से नहीं गुजरते, जिसमें नाम, मोबाइल नंबर और अन्य आवश्यक विवरण दर्ज कराने पड़ते हैं।
भाषा गोला सुरेश
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