भविष्य के युद्ध सिर्फ एआई से नहीं, बल्कि संकल्प और सैनिकों के दम पर जीते जाएंगे: राजनाथ सिंह
शफीक
- 11 Jul 2026, 04:29 PM
- Updated: 04:29 PM
(तस्वीरों के साथ)
विशाखापत्तनम, 11 जुलाई (भाषा) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार को कहा कि भविष्य के युद्ध कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से लड़े जा सकते हैं, लेकिन उनमें जीत अब भी राष्ट्रीय संकल्प, प्रशिक्षित सैनिकों और मजबूत सैन्य शक्ति के दम पर ही हासिल होगी।
यहां आईएनएस 'महेंद्रगिरि' को नौसेना में शामिल किए जाने के समारोह को संबोधित करते हुए सिंह ने यह भी कहा कि आंध्र प्रदेश भारत के रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण के नए शक्ति केंद्र के रूप में उभरा है।
रक्षा आधुनिकीकरण के प्रति सरकार के संतुलित नजरिए पर जोर देते हुए सिंह ने कहा कि भारत अगली पीढ़ी की तकनीकों में निवेश कर रहा है और साथ ही पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को भी मजबूत कर रहा है।
उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पारंपरिक और आधुनिक क्षमताओं के प्रभावी एकीकरण के उदाहरण के तौर पर 'ऑपरेशन सिंदूर' का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, ''भविष्य के युद्ध कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से लड़े जा सकते हैं, लेकिन उनमें जीत राष्ट्रीय संकल्प, प्रशिक्षित सैनिकों और सक्षम सैन्य शक्ति से ही हासिल होगी। इसलिए मैं कहूंगा कि नयी प्रौद्योगिकियां और पारंपरिक रक्षा प्रणालियां एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे को पूर्ण बनाते हैं। पारंपरिक प्रणालियों के बिना नयी प्रौद्योगिकियां अपने आप में अधूरी हैं।''
सिंह ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि नयी प्रौद्योगिकियों ने युद्ध के स्वरूप को बदल दिया है, लेकिन उन्होंने युद्ध के पारंपरिक साधनों की भूमिका को कम नहीं किया है।
उन्होंने कहा कि युद्ध के बुनियादी सिद्धांतों को पूरा करने के लिए आज भी मजबूत पारंपरिक सैन्य क्षमता जरूरी है और इसका महत्व पहले जितना ही बना हुआ है।
समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा के एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होने पर जोर देते हुए सिंह ने कहा कि व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए समुद्र बेहद महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में 'क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास' (सागर) दृष्टिकोण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहरायी।
भारत को सुरक्षा मुहैया कराने वाला एक प्रमुख देश और क्षेत्र का विश्वसनीय साझेदार बताते हुए सिंह ने कहा कि भारतीय नौसेना ने मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों, समुद्री डकैती रोधी मिशनों तथा संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों से भारतीय और विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकालने के अभियानों के जरिये लगातार अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है।
उन्होंने कहा कि इसके कारण भारतीय नौसेना ने संकट के समय सबसे पहले मदद के लिए आगे आने वाली ताकत और पसंदीदा सुरक्षा साझेदार के रूप में पहचान बनाई है।
हाल के पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारतीय नौसेना की भूमिका का उल्लेख करते हुए सिंह ने कहा कि 'ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा' के तहत नौसेना ने 9,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आवश्यक वस्तुएं ले जा रहे 18 व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित मार्ग प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि यह न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा, बल्कि भारत के आर्थिक हितों की रक्षा में भी नौसेना की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि युद्धपोत को सफलतापूर्वक नौसेना में शामिल किया जाना इस बात को दर्शाता है कि भारत स्वदेशी विशेषज्ञता के बल पर जटिल और अग्रिम मोर्चे की लड़ाकू सैन्य प्रणालियों का डिजाइन तैयार करने, उनका निर्माण करने और उन्हें तैनात करने की अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है।
यह युद्धपोत स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर, टॉरपीडो लॉन्चर, एकीकृत पनडुब्बी रोधी रक्षा प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और नजदीकी खतरों से रक्षा करने वाली हथियार प्रणाली से भी लैस है जो इसे एक मज़बूत और टिकाऊ लड़ाकू जहाज बनाता है जो चुनौतीपूर्ण समुद्री माहौल में भी काम करने में सक्षम है।
इसे 'ब्लू-वॉटर युद्धपोत' बताते हुए सिंह ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरि हवा से आने वाले खतरों, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन के जहाजों और समुद्र के भीतर पनडुब्बियों का मुकाबला कर सकता है। साथ ही, यह भारत के समुद्री हितों की रक्षा के लिए न केवल तटीय क्षेत्रों के पास, बल्कि दूर और गहरे समुद्र में भी कई सप्ताह तक लगातार तैनात रह सकता है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि 'महेंद्रगिरि' को ऐसे समय में नौसेना में शामिल किया गया है, जब ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबर युद्ध, हाइपरसोनिक हथियारों, अंतरिक्ष आधारित क्षमताओं और मानवरहित प्रणालियों के उभरने से युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक सैन्य क्षमताएं ही प्रभावी राष्ट्रीय रक्षा का आधार बनी हुई हैं।
केंद्रीय मंत्री ने आईएनएस 'महेंद्रगिरि' को तकनीकी रूप से उन्नत और युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नौसेना के निर्माण की देश की प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी नौसेना भारत के समुद्री हितों की रक्षा करते हुए भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होगी।
उन्होंने विश्वास जताया कि आईएनएस 'महेंद्रगिरि' पूर्वी समुद्री तट की सुरक्षा को मजबूत करने, गहरे और दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में भारत की अभियानगत पहुंच का विस्तार करने तथा हिंद महासागर क्षेत्र में देश की मौजूदगी को और सुदृढ़ कर भारत की समुद्री रणनीति को मजबूती देगा।
सिंह ने कहा कि स्वदेशी युद्धपोतों का निर्माण केवल लड़ाकू सैन्य प्रणालियां तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे डिजाइन क्षमता, तकनीकी विशेषज्ञता, कुशल मानव संसाधन और व्यापक समुद्री औद्योगिक तंत्र भी मजबूत होता है।
उन्होंने कहा कि पोत निर्माण से इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, प्रणोदन प्रणाली, सॉफ्टवेयर, सटीक इंजीनियरिंग और लॉजिस्टिक्स सहित विभिन्न क्षेत्रों को बढ़ावा मिलता है। इसके साथ ही रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है।
भारत को पोत निर्माण और समुद्री रक्षा नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाने के सरकार के दृष्टिकोण को दोहराते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 'मैरीटाइम इंडिया विजन 2030', समुद्री विकास कोष, पोत निर्माण वित्तीय सहायता योजना और पोत निर्माण विकास योजना जैसी पहलों का उद्देश्य बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, अंतर्देशीय जलमार्गों का विस्तार, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत करना, औद्योगिक क्षमता बढ़ाना और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करना है।
सिंह ने युवा उद्यमियों, इंजीनियरों, नवप्रवर्तकों, शोधकर्ताओं और निवेशकों से भी राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।
उन्होंने उनसे ऐसी उन्नत प्रौद्योगिकियां और रक्षा प्रणालियां विकसित करने को कहा, जो भविष्य के युद्ध का स्वरूप तय करने के साथ रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूत करेंगी।
सिंह ने कहा कि 'महेंद्रगिरि' का नौसेना में शामिल होना रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र और उसके बाहर देश के समुद्री हितों की रक्षा करने की नौसेना की अभियानगत क्षमता और मजबूत होगी।
भाषा गोला शफीक
शफीक
1107 1629 विशाखापत्तनम