कोविड ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले बिजलीकर्मी की विधवा को 50 लाख रुपये दे सरकार : उच्च न्यायालय
सं, जफर रवि कांत
- 07 Jul 2026, 11:44 PM
- Updated: 11:44 PM
लखनऊ, सात जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने माना है कि मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एमवीवीएनएल) का एक कर्मचारी, जिसकी कोविड-19 महामारी के दौरान अस्पतालों, ऑक्सीजन संयंत्रों और घरों में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के दौरान संक्रमण से मृत्यु हो गई थी, 'कोविड योद्धा' था।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह कर्मचारी की विधवा को अनुग्रह सहायता के रूप में 50 लाख रुपये की राशि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर अदा करे।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने पुष्पा देवी द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।
पीठ ने छह अक्टूबर, 2022 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि मृतक राज्य सरकार के 11 अप्रैल, 2020 के उस शासनादेश के दायरे में नहीं आता, जिसमें अग्रिम पंक्ति के कोविड कर्मियों को अनुग्रह सहायता देने का प्रावधान है।
याचिका के अनुसार, मृतक एमवीवीएनएल में कार्यरत था और कोविड-19 महामारी के दौरान उसे अस्पतालों, ऑक्सीजन संयंत्रों तथा अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
याचिका में कहा गया कि इन दायित्वों का निर्वहन करते समय वह कोविड-19 से संक्रमित हो गया और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। मुख्य चिकित्सा अधिकारी और बिजली विभाग द्वारा जारी प्रमाणपत्रों में मृत्यु का कारण कोविड-19 बताया गया तथा यह भी प्रमाणित किया गया कि वह अग्रिम पंक्ति के कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा था।
बिजली विभाग ने मृतक के परिजनों को अनुग्रह सहायता दिए जाने की सिफारिश की थी, लेकिन राज्य सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया था।
अपने पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि ''कोविड ड्यूटी'' की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती, ताकि उसका दायरा केवल अस्पतालों में मरीजों का उपचार करने वाले कर्मचारियों तक सीमित रह जाए।
अदालत ने कहा कि बिजली, जलापूर्ति, पुलिस और अन्य आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों ने भी महामारी से निपटने और कोविड मरीजों के उपचार की व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए उन्हें भी 'कोविड योद्धा' माना जाना चाहिए।
इस मामले को नए सिरे से विचार के लिए सरकार के पास भेजने से इनकार करते हुए पीठ ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु को पांच वर्ष से अधिक समय बीत चुका है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को अब और प्रतीक्षा कराने का कोई औचित्य नहीं है। इसलिए राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर अनुग्रह सहायता की राशि जारी करने का निर्देश दिया गया।
भाषा
सं, जफर रवि कांत
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