ओडिशा में सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर विशेषज्ञों ने जताई चिंता
माधव
- 06 Jul 2026, 10:22 PM
- Updated: 10:22 PM
(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) विशेषज्ञों ने अलग-अलग प्राधिकारों को एक खुला पत्र लिखकर ओडिशा में वेदांता कंपनी की प्रस्तावित सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इससे जैव-विविधता, वन्यजीवों के वास स्थल तथा जंगल पर निर्भर समुदायों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
इस परियोजना में 31.1 करोड़ टन उच्च श्रेणी के बॉक्साइट भंडार का खनन शामिल है और यह 1,549 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली होगी, जिसके लिए 709.72 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग करना होगा।
भारतीय वन सेवा (आईएफएस) की पूर्व अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति की पूर्व सदस्य प्रेरणा सिंह बिंद्रा द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, ''हम विनम्रतापूर्वक निवेदन करते हैं कि इस परियोजना को दी गई स्वीकृतियां वापस ली जाएं और यदि कोई और मूल्यांकन किया जाता है, तो उसकी स्वतंत्र रूप से और वैज्ञानिक रूप से समीक्षा की जाए।''
हाल में, मई में इस परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति से जरूरी मंजूरी मिली। यह मंजूरी इस शर्त पर दी गई कि दूसरे चरण की औपचारिक वन मंजूरी लिए बिना 709.72 हेक्टेयर वन भूमि पर कोई खनन गतिविधि नहीं की जाएगी।
यह परियोजना ओडिशा के कालाहांडी और रायगढ़ जिलों के 18 गांवों में फैला हुआ है और इससे कथित तौर पर 162 परिवार विस्थापित होंगे।
रविवार को जारी किये गए पत्र के अनुसार, यह इलाका संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जिसके लिए पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 का सख्ती से पालन करना जरूरी है।
पत्र में कहा गया है, ''इसके बजाय, स्थानीय ग्राम सभाओं की कानूनी रूप से जरूरी पूर्व सहमति के बिना ही निजी खनन को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्थानीय समुदायों ने बताया है कि जिला प्रशासन ने सहमति फॉर्म पर दस्तखत करने के लिए आदिवासी आबादी पर दबाव बनाने के वास्ते पुलिस के जरिए डराया-धमकाया।''
श्रीवास्तव और बिंद्रा ने यह भी आरोप लगाया कि भले ही पहले चरण की मंज़ूरी में कहा गया है कि परियोजना वाली जगह पर पेड़ काटने से पर्यावरण पर बहुत कम असर पड़ेगा क्योंकि वहां पेड़-पौधे कम हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
पत्र के मुताबिक, इस इलाके में ''कई तरह के पारंपरिक औषधीय पौधे पाए जाते हैं, जिनमें वे पौधे भी शामिल हैं जिन्हें स्थानीय कोंध समुदाय के वैद्य बहुत महत्व देते हैं।''
पत्र में कहा गया है कि स्थानीय संगठनों और विशेषज्ञों के अनुसार, खनन के लिए होने वाले विस्फोटों से 100 से अधिक बारहमासी जलधाराएं तथा पानीचिडा-शुआगड़ नदी प्रभावित होंगी या स्थायी रूप से नष्ट हो सकती हैं। इससे कृषि सिंचाई और जलीय जीवों को गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।
पत्र में यह भी कहा गया है कि धूल, विस्फोट और भारी वाहनों की आवाजाही से स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों, विशेषकर फेफड़ों को लंबे समय तक होने वाली गंभीर क्षति जैसे श्वसन संबंधी खतरों, की भी अनदेखी की गई है।
भाषा सुभाष माधव
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