मानसून की अनिश्चितता के बावजूद राजस्थान के नागौर में किसानों ने मूंगफली खेती पर बड़ा दांव लगाया
अजय
- 01 Jul 2026, 07:31 PM
- Updated: 07:31 PM
(लक्ष्मी देवी ऐरे)
नागौर, एक जुलाई (भाषा) राजस्थान के नागौर जिले के धमनिया गांव के किसान 54 वर्षीय बुधराम ने चालू खरीफ सत्र में अपनी छह हेक्टेयर जमीन पर बारिश पर निर्भर तीन फसलें बोई हैं - मूंगफली, मूंग और बाजरा।
इनमें से तीन हेक्टेयर में मूंगफली, दो हेक्टेयर में मूंग और बाकी एक हेक्टेयर में बाजरा की बुवाई की गई है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण हुई मानसून पूर्व बारिश का फायदा उठाते हुए तीनों फसलें जून में समय पर बोई गई थीं।
अब, सिंचाई का कोई साधन न होने के कारण, बुधराम दक्षिण-पश्चिम मानसून के समय पर आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। मूंगफली, जो उनकी जमीन के सबसे बड़े हिस्से पर बोई गई है, उनके द्वारा बोई गई तीनों फसलों में सबसे ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसल भी है।
जोखिम के बावजूद, उन्होंने मूंगफली का रकबा बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने पीटीआई-भाषा को अपना तर्क समझाते हुए कहा, ''इससे दूसरी दो फसलों की तुलना में अधिक मुनाफा मिलता है, भले ही कम बारिश के कारण पैदावार कम हो जाए।''
बुधराम ने कहा, ''मूंगफली से मूंग की तुलना में अधिक कमाई होती है। एक हेक्टेयर में मुझे 10 क्विंटल पैदावार मिलती है। इसकी फसल के अवशेष (चारा और छिलके) बहुत पौष्टिक होते हैं और पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।''
इसकी तुलना में, मूंग की खेती कम पानी में भी हो सकती है, लेकिन अक्सर उपज काली पड़ जाती है और पैदावार पर असर पड़ता है।
इसी जिले के बालावास गांव के 50 वर्षीय सुखराम ने भी बड़े पैमाने पर ऐसा ही हिसाब-किताब किया है। इस खरीफ सत्र में उन्होंने जितनी 12-13 हेक्टेयर जमीन पर बुवाई की है, उसमें से सात हेक्टेयर में मूंगफली, तीन हेक्टेयर में मूंग और दो हेक्टेयर में बाजरा और ग्वार बोया है। उन्होंने भी इस साल कमजोर मानसून की आशंका के बावजूद मूंगफली का रकबा बढ़ाने का फैसला किया।
उन्होंने कहा, ''तीनों फसलों में, मूंगफली आमतौर पर बाजार में मजबूत मांग, खाद्य तेल के रूप में उच्च मूल्य और सरकारी समर्थन के कारण सबसे अधिक और स्थिर आर्थिक लाभ देती है।''
उन्होंने कहा कि हालांकि मूंगफली के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता होती है, लेकिन इसकी पैदावार अन्य फसलों की तुलना में अधिक होती है।
मूंगफली के प्रति यह प्राथमिकता केवल इन दो किसानों तक ही सीमित नहीं है। राजस्थान के कृषि आयुक्तालय में कृषि (विस्तार) के अतिरिक्त निदेशक सुरेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, ''कपास के बाद, मूंगफली राज्य की एक प्रमुख नकदी फसल है। बेहतर मुनाफ़े के कारण, कई किसानों ने इसकी बुवाई की है।''
राज्य के आंकड़ों के अनुसार, जून के अंत तक मूंगफली की बुवाई का रकबा 23.57 प्रतिशत बढ़कर 7.13 लाख हेक्टेयर हो गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 5.76 लाख हेक्टेयर था।
गौरतलब है कि मूंगफली की ओर यह झुकाव तब देखा जा रहा है जब मूंग (ग्रीन ग्राम) का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) अधिक है। फसल वर्ष 2026-27 (जुलाई-जून) के लिए, मूंगफली का एमएसपी 7,517 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि मूंग का एमएसपी 8,780 रुपये प्रति क्विंटल और बाजरे का एमएसपी 2,900 रुपये प्रति क्विंटल है।
इससे पता चलता है कि किसान फसल के तरीके का निर्णय लेते समय केवल एमएसपी के बजाय बाज़ार की कुल मांग और मुनाफ़े पर विचार कर रहे हैं।
शेखावत ने कहा, ''दक्षिण-पश्चिम मानसून अभी यहां नहीं पहुंचा है। अगले दस दिन राज्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। हम स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं।''
फ़िलहाल, बुधराम और सुखराम जैसे किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं, क्योंकि वे पहले ही मूंगफली की खेती का दांव खेल चुके हैं।
भाषा राजेश राजेश अजय
अजय
0107 1931 नागौर(राजस्थान)