शिवसेना 60 साल की हुई: उद्धव गुट के सामने अस्तित्व का संकट, शिंदे गुट अहमियत के लिए जूझ रहा
माधव
- 19 Jun 2026, 05:05 PM
- Updated: 05:05 PM
मुंबई, 19 जून (भाषा) शिवसेना के दोनों गुट शुक्रवार को पार्टी के 60 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। हालांकि, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट जहां अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है, वहीं एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट भाजपा के दबदबे वाले दौर में अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है।
कभी 25 साल तक भाजपा की मजबूत सहयोगी रही अविभाजित शिवसेना महाराष्ट्र में गठबंधन के भीतर लगभग ''बड़े भाई'' की भूमिका में थी, लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सत्ता का समीकरण बदल गया है।
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दोनों दलों के बीच गठबंधन टूट गया। चार महीने से भी कम समय में वे फिर साथ आ गए, लेकिन उनके रिश्ते कभी पहले जैसे नहीं हुए; उनमें हमेशा तनाव बना रहा और ऐसा लगा मानो वे किसी भी समय अलग हो सकते हैं।
साल 2019 में भी ऐसा ही हुआ, जब मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना ने भाजपा के नेतृत्व वाले राजग से नाता तोड़ लिया। इस अलगाव के बाद ऐसी स्थितियां बनीं जिनसे पार्टी दो गुटों में बंट गई।
ऐसा नहीं है कि शिवसेना के लिए बगावत कोई नयी बात थी। छगन भुजबल, गणेश नाइक, नारायण राणे और राज ठाकरे जैसे बड़े नेताओं की बगावत का सामना पार्टी पहले भी कर चुकी थी, लेकिन 2022 में शिंदे की अगुवाई में हुई बगावत काफी बड़ी थी, जिसने शिवसेना को ही दो हिस्सों में बांट दिया।
शिवसेना में निचले स्तर से ऊपर आए शिंदे, उस समय 39 विधायकों और 13 सांसदों के साथ अलग हो गए थे। बाद में, उनके गुट को पार्टी का नाम और उसका 'धनुष-बाण' वाला चुनाव चिह्न भी मिल गया।
बाल केशव ठाकरे ने 1966 में शिवसेना की स्थापना की थी, जिन्हें बालासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। वह एक कार्टूनिस्ट और समाज सुधारक केशव (प्रबोधनकर) ठाकरे के बेटे थे, जिन्होंने 'मराठी मानुस' यानी महाराष्ट्र की मराठी भाषी आबादी के हितों की वकालत की।
बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र, और खासकर मुंबई में शिवसेना को एक मज़बूत ताकत बनाया। शिवसैनिकों ने ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के तौर पर अपनी पहचान बनाई, जो पार्टी के मुद्दों के लिए ज़ोर-शोर से लड़ते थे।
इन 60 वर्षों में, अविभाजित शिवसेना के तीन मुख्यमंत्री रहे – मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे। हालाँकि, इनमें से कोई भी अपना पाँच साल का पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। 2022 में पार्टी में विभाजन के बाद, शिंदे ने ढाई साल तक सरकार का नेतृत्व किया।
राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई ने कहा कि दोनों गुटों, खासकर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उबाठा) के सामने, बाल ठाकरे के समय की तुलना में कहीं ज़्यादा मुश्किल चुनौती है।
उन्होंने कहा, ''बाल ठाकरे का दौर भाजपा के दबदबे वाला नहीं था, लेकिन शिवसेना के दोनों गुट अब उसी दौर में हैं।''
देसाई ने कहा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट के सामने कहीं बड़ा संकट है।
सिर्फ़ 20 विधायकों के साथ, विधानसभा में विपक्ष के खेमे में शिवसेना (दबाठा) भले ही सबसे बड़ी पार्टी हो, लेकिन सदन में शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के पास उससे लगभग तीन गुना ज़्यादा विधायक हैं।
ठाकरे के नेतृत्व वाली अविभाजित शिवसेना ने 1997 से 2022 तक लगातार 25 वर्ष तक बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) पर नियंत्रण बनाए रखा। साल 2022 में पार्षदों का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही नगर निकाय पर पार्टी का नियंत्रण भी समाप्त हो गया। इसके बाद 2026 में हुए निकाय चुनाव में, बीएमसी में भाजपा अपना महापौर बनाने में सफल रही।
राज्य में शिवसेना (उबाठा) का अभी सिर्फ़ एक महापौर है – परभणी नगर निकाय में।
देसाई ने यह भी कहा कि उद्धव के गुट के सामने आए संकट में उम्मीद की एक किरण भी है। वह नयी शुरुआत कर सकते हैं, हालांकि इसके लिए बहुत ज़्यादा कोशिशों की ज़रूरत होगी, खासकर उद्धव के बेटे और उनके उत्तराधिकारी आदित्य ठाकरे की तरफ़ से।
शिंदे 2014 से सत्ता में हैं - पहले देवेंद्र फडणवीस सरकार में, फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार में, बाद में 2022 से 2024 तक मुख्यमंत्री के तौर पर और 2024 से उपमुख्यमंत्री के तौर पर।
दिल्ली स्थित 'सेंटर फॉर डेवलपिंग स्टडीज़ एंड सोसाइटीज़' के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार ने कहा कि शिवसेना के दोनों गुटों की अहमियत को क्षेत्रीय दलों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, खासकर उन दलों में जहाँ सत्ता का हस्तांतरण मुख्य परिवार के भीतर हो सकता है। आंकड़े बताते हैं कि 'वोट शेयर' के मामले में दोनों गुटों की अहमियत कम हो गई है।
ठाकरे के नेतृत्व वाली अविभाजित शिवसेना में हुई फूट का ज़िक्र करते हुए कुमार ने कहा कि उनके गुट में एक और फूट पड़ने की स्थिति आन पड़ी है तथा ऐसा नहीं लगता कि इसने तृणमूल कांग्रेस से कोई सीख ली है, जिसके लोकसभा सदस्यों ने एक अलग गुट बनाया और बाद में एनसीपीआई में विलय कर लिया।
कुमार ने कहा, ''उद्धव गुट के और बड़ी मुश्किल में फंसने की संभावना ज़्यादा है क्योंकि वह सत्ता में नहीं है।''
उन्होंने कहा कि जहाँ शिवसेना (उबाठा) के छह सांसद कम होने वाले हैं, वहीं विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार का सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि कोई पार्टी राज्यसभा में कितने सदस्य भेजती है।
कुमार ने कहा कि इससे राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी की हिस्सेदारी पर भी असर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि शिवसेना (उबाठा) को न सिर्फ़ नेतृत्व से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि उसे विचारधारा संबंधी संकट का भी सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि भाजपा ने उसका हिंदुत्व का मुद्दा ''छीन'' लिया है।
कुमार ने कहा कि शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के कुछ समय तक अहम बने रहने की संभावना है, क्योंकि राज्य चुनाव में भाजपा के पास अभी भी पूर्ण बहुमत नहीं है।
उन्होंने कहा, ''धीरे-धीरे शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना भी बिहार में जद (यू) की तरह ही अपनी अहमियत खोती जा रही है।''
भाषा नेत्रपाल माधव
माधव
1906 1705 मुंबई