अनुशासनात्मक प्राधिकारी को सेवा से बर्खास्तगी की सजा देने से पहले गहन विचार करना चाहिए: न्यायालय
रंजन
- 11 Jun 2026, 09:35 PM
- Updated: 09:35 PM
नयी दिल्ली, 11 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि एक अनुशासनात्मक प्राधिकारी को सेवा से बर्खास्तगी की कड़ी सजा देने से पहले बहुत गहन विचार करना चाहिए क्योंकि इसका न केवल बर्खास्त कर्मचारी पर बल्कि उनके आश्रित परिवार के सदस्यों पर भी बहुत गंभीर प्रभाव पड़ता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी उन मामलों के लिए ही रहनी चाहिए जहां कदाचार सबसे गंभीर प्रकृति का है और जहां सहानुभूतिपूर्ण या नरम रवैया अपनाना अनुचित और अनुपयुक्त हो।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणियां उस महिला द्वारा दायर अपील पर कीं, जो महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड में कार्यरत थी और सेवा से बर्खास्त कर दी गई थी।
पीठ ने कहा, ''बर्खास्तगी सामान्यतः तब उचित मानी जाती है जब कदाचार इतना गंभीर हो कि कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना अनुशासन, विश्वास या संस्थागत कार्यप्रणाली के पूरी तरह प्रतिकूल हो।''
शीर्ष अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार, गबन, नियोक्ता को भारी नुकसान पहुंचाने वाले कृत्य या निरंतर सेवा के लिए पूर्ण अयोग्यता दर्शाने वाले आचरण से जुड़े मामले अलग श्रेणी में आते हैं।
न्यायालय ने कहा, ''सेवा से बर्खास्तगी की सजा के संबंध में सक्षम प्राधिकारी को अपीलकर्ता की लंबी सेवा, पूर्व रिकॉर्ड, आयु, कदाचार की प्रकृति, वित्तीय नुकसान होने या नहीं होने तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर गौर करने के बाद, सेवा से बर्खास्तगी जैसी सजा के बजाय किसी अन्य सजा पर विचार करना चाहिए।''
उच्चतम न्यायालय ने जुलाई 2017 के बर्खास्तगी आदेश को ''पूरी तरह से असंगत'' बताते हुए रद्द कर दिया, जबकि कदाचार के निष्कर्ष को बरकरार रखा।
इसने कहा कि अपीलकर्ता अप्रैल 1985 में सेवा में शामिल हुई थी और सितंबर 2006 में उन्हें जांच लंबित रहने तक निलंबित कर दिया गया था।
न्यायालय ने कहा कि निलंबन आदेश में अनुशासनहीनता, वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना, असहयोग, सरकारी दस्तावेजों में छेड़छाड़ और लापरवाही जैसे आरोप लगाए गए थे।
पीठ ने कहा कि निलंबन की अवधि लगभग 11 वर्षों तक जारी रही और प्राधिकारी ने जुलाई 2017 में उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश पारित किया।
शीर्ष अदालत उनकी उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के अप्रैल 2024 के फैसले को चुनौती दी थी, जिसने उनकी बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा था।
पीठ ने कहा, ''सेवा से बर्खास्तगी किसी दोषी कर्मचारी पर लगाई जाने वाली सबसे सख्त सजा है। यह नियोक्ता और कर्मचारी के संबंध को स्थायी रूप से समाप्त कर देती है और सामान्यतः कर्मचारी को उसके पूर्व सेवा से जुड़े लाभों, जिसमें सेवानिवृत्ति लाभ भी शामिल हैं, से वंचित कर देती है।''
अदालत ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी केवल कर्मचारी की मौजूदा आय के स्रोत के नुकसान तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके आश्रित परिवार के सदस्यों की आय पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
पीठ ने कहा, ''इस प्रकार, इसका विनाशकारी प्रभाव न केवल बर्खास्त कर्मचारी पर पड़ेगा, बल्कि उन सभी पर भी पड़ेगा जो उस कर्मचारी पर आश्रित हैं।''
इसने कहा, ''इसके प्रभाव की गंभीरता को देखते हुए, जो न केवल कर्मचारी बल्कि उसके आश्रितों पर भी पड़ता है, अनुशासनात्मक प्राधिकारी को सेवा से बर्खास्तगी जैसी सबसे कठोर सजा देने में बहुत सतर्कता बरतनी चाहिए।''
अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, पीठ ने यह भी कहा कि निलंबन को सजा मानकर दूसरी सजा देना स्वीकार्य नहीं है।
पीठ ने कहा कि प्राधिकारी को उसके फैसले की प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर, कदाचार की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, बर्खास्तगी के अलावा प्रस्तावित सजा के संबंध में अपीलकर्ता को उचित कारण बताओ नोटिस जारी करना चाहिए।
इसने प्राधिकारी को आठ सप्ताह के भीतर दंड के संबंध में एक आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा कि क्योंकि अपीलकर्ता सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुकी है, इसलिए इस चरण पर सेवा में बहाली का कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।
भाषा
देवेंद्र रंजन
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