लू से निपटने के लिये 'पैसिव कूलिंग' को माना जाए जन स्वास्थ्य उपाय : विशेषज्ञ
नरेश
- 10 Jun 2026, 05:19 PM
- Updated: 05:19 PM
(अपर्णा बोस)
नयी दिल्ली, 10 जून (भाषा) नींद में खलल डालने और गर्भावस्था के लिए खतरा बनने से लेकर रोजी-रोटी पर असर डालने तक, लू का सबसे बुरा असर शहरों में रहने वाले गरीब लोगों पर पड़ता है। अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि छतों, दीवारों और सार्वजनिक जगहों पर 'पैसिव कूलिंग' (बिना बिजली या मशीन के ठंडा रखने का तरीका) की व्यवस्था करना जन स्वास्थ्य के लिए एक ऐसा कदम है जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के कार्यक्रम प्रबंधक बेंजामिन हिकमैन ने पैसिव कूलिंग के मौजूदा तरीकों पर बात करते हुए कहा कि ठंडी छतें कम आय वाले इलाकों में गर्मी को दूर रखने में मदद कर सकती हैं, लेकिन ये तब सबसे अच्छा काम करती हैं जब इन्हें दूसरे किफायती उपायों के साथ मिलाया जाए, जैसे कि रूफ इंसुलेशन, सही भवन निर्माण सामग्री, पारंपरिक तरीके और खिड़कियों, दीवारों व छतों पर छाया की व्यवस्था।
सतत शीतलन पर पहल का नेतृत्व करने में 12 साल बिताने वाले हिकमैन ने रेखांकित किया कि एक गंभीर रूप से नजरअंदाज किया गया पहलू है-दिन में खिड़कियां बंद रखते हुए रात में भवनों से गर्मी निकालना, विशेषकर निकास और जबरन हवा के प्रवाह के माध्यम से।
यूएनईपी अधिकारी ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया, "लेकिन इन तरीकों को जलवायु क्षेत्रों के हिसाब से अपनाना होगा। गर्म और सूखे इलाकों में इंसुलेशन और छाया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जबकि नमी वाले इलाकों में वेंटिलेशन (जिसमें एग्जॉस्ट फैन भी शामिल हैं) और छाया सबसे ज़्यादा असरदार होते हैं।"
नयी दिल्ली के कश्मीरी गेट बस टर्मिनल पर अपनी ठंडी छत परियोजना का उदाहरण देते हुए उन्होंने फुटपाथ, बस स्टॉप और साइकिल अवसंरचना जैसी बाहरी जगहों पर 'पैसिव कूलिंग' और प्रकृति-आधारित समाधानों के महत्व पर जोर दिया। इन जगहों पर कमज़ोर वर्गों के लोगों का काफ़ी आना-जाना होता है।
उन्होंने आगे कहा कि फ़ैक्टरियों या निर्माण स्थलों पर गर्मी के ज़्यादा संपर्क में रहने वाले कर्मचारियों के लिए समाधानों में ठंडा रखने वाली जैकेट, अच्छी छाया वाली आराम करने की जगहें, काम के घंटों में बदलाव और गर्मी की वजह से काम रुकने पर पैरामीट्रिक बीमा शामिल हैं।
हिकमैन ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया, "कम आय वाले इलाकों में लू की वजह से बिजली जाने की समस्या का असर बहुत ज़्यादा होता है, क्योंकि उस समय ठंडक के लिए बिजली की मांग सबसे ज़्यादा होती है; जबकि इन इलाकों के लोग इस मांग में सबसे कम योगदान देते हैं। एक एयर कंडीशनर, सीलिंग फैन के मुकाबले 30 गुना ज्यादा बिजली इस्तेमाल करता है।"
उन्होंने कहा, "अगर हम खास तौर पर भीषण गर्मी पर ध्यान दें, तो पैसिव कूलिंग सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक अहम ज़रिया है जो लू के दौरान लोगों की सुरक्षा कर सकता है, और हम जानते हैं कि यह कारगर है।"
ज़्यादा गर्मी के कमज़ोर तबके के लोगों पर पड़ने वाले असर के बारे में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टर हर्षल साल्वे ने इसे दो श्रेणियों में बांटा है: कम समय के लिए होने वाले गंभीर असर, जैसे दौरे पड़ना, उलझन और हीट स्ट्रोक; और लंबे समय तक रहने वाले असर, जिनसे धीरे-धीरे उच्च रक्तचाप और दिल से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।
साल्वे ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया, "गर्भवती महिलाओं में गर्मी के संपर्क में आने से मां और नवजात शिशु दोनों पर असर पड़ता है; इससे जन्म के समय कम वज़न, समय से पहले प्रसव और जन्मजात विकृतियां हो सकती हैं।" साल्वे का आईसीएमआर-समर्थित शोध दिल्ली-एनसीआर में काम करने की जगहों पर गर्मी के असर का आकलन कर रहा है।
पैसिव कूलिंग की क्षमता के बारे में बताते हुए, महिला हाउसिंग ट्रस्ट के निदेशक सिराज हिरानी ने कहा कि राजस्थान के जोधपुर, जयपुर और चूरू में पूरी तरह से पैसिव तकनीक पर बने कूलिंग स्टेशन बिना बिजली के ही बाहर के तापमान से 10 से 12 डिग्री सेल्सियस कम तापमान बनाए रखते हैं।
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