मिजोरम: म्यांमा सीमा पर ईडी की छापेमारी, 970 करोड़ रुपये का सुपारी तस्करी रैकेट उजागर
माधव
- 04 Jun 2026, 10:30 PM
- Updated: 10:30 PM
नयी दिल्ली/आइजोल, चार जून (भाषा) प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बृहस्पतिवार को सीमा पार म्यामां से होने वाली सुपारी की तस्करी और उससे जुड़े 970 करोड़ रुपये के धन शोधन मामले की जांच के तहत मिजोरम में म्यामां सीमा से लगे कई स्थानों पर छापे मारे।
केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों ने बताया कि सीमावर्ती शहर चंफई में इस कथित तस्करी नेटवर्क के स्थानीय मददगारों के नौ परिसरों पर छापेमारी की गई।
ईडी ने एक बयान में कहा कि यह कार्रवाई केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज एक प्राथमिकी (एफआईआर) के आधार पर धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दर्ज मामले के बाद की गई है।
सीबीआई की यह प्राथमिकी चंफई के रास्ते म्यामां से भारत में अवैध रूप से आयात की जाने वाली सूखी सुपारी की "बड़े पैमाने पर" तस्करी के आरोपों पर दर्ज की गई थी।
जांच एजेंसी ने बताया कि सीबीआई की प्राथमिकी गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा जुलाई 2024 में इस मुद्दे पर एक जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के दौरान दिए गए आदेश के आधार पर दर्ज की गई थी।
ईडी के अनुसार, साल 2013 से 2025 के बीच (पिछले 13 वर्षों के दौरान) इस तस्करी नेटवर्क के जरिए अवैध रूप से 970 करोड़ रुपये की काली कमाई जुटाई गई।
आरोप है कि म्यामां के नागरिकों ने जोखावथर और चंफई में बिना सीमा शुल्क मंजूरी के तिउ नदी के रास्ते सूखी सुपारी (जिसे बर्मी सुपारी भी कहा जाता है) की भारत में तस्करी की और सीमा पर स्थानीय मददगारों को खेप सौंप दी।
बयान में कहा गया, "स्थानीय मददगार इन तस्करी की गई सुपारियों को चंफई के गोदामों में जमा करते थे और असम-मिजोरम सीमा पर स्थित वैरेंगते तक उनके परिवहन की व्यवस्था करते थे। इस पूरे नेटवर्क का वित्तपोषण सिलचर (असम) के व्यापारियों और फाइनेंसरों द्वारा किया जाता था, जो बैंकिंग के माध्यम से मिजोरम के मददगारों के खातों में बड़ी रकम भेजते थे।"
एजेंसी के मुताबिक, म्यामां के आपूर्तिकर्ताओं को भारतीय मुद्रा में भुगतान किया जाता था, जिसे बाद में सीमा के पास कुछ लोगों की मदद से म्यामां की मुद्रा में बदल दिया जाता था।
ईडी की जांच में सामने आया कि साल 2021 से 2024 के दौरान चंफई जिले में सुपारी की आवाजाही के लिए फर्जी बागान प्रमाण पत्र और झूठे सीमा शुल्क मंजूरी दस्तावेजों का उपयोग करके 251.19 करोड़ रुपये (एसजीएसटी) और 86.25 करोड़ रुपये (सीजीएसटी) के ई-वे बिल "फर्जी तरीके से" जारी किए गए थे, जबकि वे बागान मालिक जीएसटी के तहत पंजीकृत भी नहीं थे।
ईडी ने आरोप लगाया कि स्थानीय मददगारों को सुपारी की खरीद, परिवहन, सुरक्षा और सीमा शुल्क से छुड़ाने जैसी गतिविधियों के लिए 2 से 15 रुपये प्रति किलोग्राम तक का कमीशन मिलता था।
एजेंसी ने बताया कि इस कार्यप्रणाली का एक "मुख्य हिस्सा" यह था कि जब्त की गई खेपों को अस्थायी रूप से छुड़ाने के लिए सीमा शुल्क अधिकारियों के सामने स्थानीय लोगों को "मुखौटा" के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। प्रत्येक जब्ती को छुड़ाने की प्रक्रिया के लिए सीमा शुल्क विभाग को 20 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये से अधिक तक का भुगतान किया जाता था।
कई मामलों में ईडी ने पाया कि तस्करी की गई सुपारी को कानूनी रूप से आयातित माल दिखाने के लिए सीमा शुल्क अधिकारियों के समक्ष धोखाधड़ी से असंबंधित 'बिल ऑफ एंट्री' (आयात दस्तावेज) पेश किए गए थे।
ईडी ने कहा, "आरोपियों के बैंक खातों के विश्लेषण से पता चला है कि साल 2013-2025 के बीच कई खातों के माध्यम से 970 करोड़ रुपये से अधिक की अपराध की कमाई को इधर-उधर किया गया।"
भाषा सुमित माधव
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