मिट चुकी यादों की धागों से बुनी कहानी : वेनिस में सुमाक्षी सिंह की अद्भुत प्रस्तुति
नरेश
- 25 May 2026, 05:50 PM
- Updated: 05:50 PM
(तस्वीरों के साथ)
(कुणाल दत्त)
नयी दिल्ली, 25 मई (भाषा) कलाकार सुमाक्षी सिंह के नाना-नानी का दिल्ली में एक शानदार घर होता था लेकिन वक्त की आंधियों के साथ इसके दरो दीवार ढह गए। उन गिरती हुई दीवारों की अब कुछ चुनिंदा निशानियां ही बची हैं। उसी महलनुमा घर को अपनी कला से सुमाक्षी ने एक नया रूप दिया है जिसे देखकर लगता है कि मिट चुकी निशानियों का अक्स हवाओं में नजर आ रहा है।
इटली के वेनिस शहर की ऐतिहासिक आर्सेनल इमारत में पतले स्टील के तारों से लटकी धागों की बेहद जटिल बुनावट इस कृति को और भी रहस्यमयी बना देती है। कला के जादू के जरिए फिर से जीवित किया गया यह उजाड़ घर अपने आकर्षण से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है।
फिलहाल वेनिस बिनाले के इंडिया पवेलियन में प्रदर्शित की जा रही 'पर्मानेंट एड्रेस' शीर्षक वाली यह कृति सुमाक्षी के लिये न केवल उस घर के कलात्मक पुनर्जीवन का प्रयास है जिसे उनके नाना-नानी ने बनाया था और जिसमें वे रहते थे, बल्कि यह लाजपत नगर स्थित 33, लिंक रोड वाले घर के छूट जाने के दर्द को स्वीकारने और उससे उबरने का एक माध्यम भी है।
आर्ट डेको शैली से प्रेरित इस घर को 1951 से बनाया जाना शुरू किया गया था और इसे पूरा होने में कई वर्ष लगे थे। लगभग आठ महीने पहले इसे ध्वस्त कर दिया गया।
गुरुग्राम की इस कलाकार ने अपनी प्रदर्शनी में इस घर को खंडित और आंशिक रूप से ध्वस्त दिखाया है। वह चाहती थी कि इसे देखने के बाद "लोगों का दिल उस दर्द को महसूस करे" जो घरों की टूटन से जुड़ा होता है।
वेनिस से 'पीटीआई-भाषा' को फोन पर दिए एक साक्षात्कार में सुमाक्षी ने बताया कि 'परमानेंट एड्रेस' में उन्होंने स्वतंत्रता के बाद बने उस घर का "लगभग वास्तविक आकार का, महीन धागों से पुनर्निर्माण" करने का प्रयास किया है, जिसे उनके नाना-नानी ने विभाजन के बाद पाकिस्तान से शरणार्थी के रूप में भारत आने के बाद बनाया था।
उन्होंने कहा, "मेरे नाना-नानी के निधन के बाद, ये घर (33, लिंक रोड) बहुत मजबूत दिखता था और लगता था कि यह हमेशा ऐसा ही रहेगा। लेकिन धीरे-धीरे ये उजाड़ होता चला गया, मानो कोई भूतिया जगह हो। इसलिए, घर के ध्वस्त होने से पहले मैं उसमें गयी और मैंने हर एक ईंट, हर दरार, हर कब्ज़ा, हर बोल्ट, हर छोटी से छोटी चीज को नापा और उसे अपने काम में उतारने की कोशिश की।"
कलाकार ने याद करते हुए बताया कि इसे बनाने में कई साल लगे, इसलिए "कोई भी दो बोल्ट एक ही आकार के नहीं हैं" और खिड़की में लगी ठोस धातु की ग्रिल पर इनेमल की कई परतें चढ़ी हुई हैं।
द्विवार्षिक प्रदर्शनी के पारंपरिक स्थल आर्सेनले में, पतले स्टील के तार धागे की कारीगरी और जटिल कढ़ाई की एक भूलभुलैया को थामे हुए हैं, जिसमें ईंटें, खिड़कियां, दरवाजे, दीवारों पर दरारें, सजावटी ग्रिल दर्शाए गए हैं, जो अतीत की यादों को संजोए, एक खोए हुए संबंध और रेशमी कपड़े में जमी हुई स्मृति को जगाते हैं।
उन्होंने कहा, "मैं चाहती थी कि यह कृति क्षणभंगुर और कुछ हद तक पारदर्शी दिखाई दे। मैं एक त्रि-आयामी घर 'निर्मित' नहीं करना चाहती थी। मैं चाहती थी कि यह वैसा लगे जैसे किसी फूल को किताब के पन्नों के बीच दबा दिया गया हो और वह कभी अस्तित्व में रही किसी चीज़ की चपटी स्मृति बन गया हो। यह स्मृतियों के उन अलौकिक परदों जैसी है, जो किसी भूलभुलैया की तरह सजे हुए हों।"
उन्होंने बताया कि लिंक रोड स्थित 33 नंबर के घर का कलात्मक रूप से निर्मित स्वरूप 20 फुट ऊंचा और 27 फुट चौड़ा है जबकि मूल घर 60 फुट चौड़ा और 35 फुट ऊंचा था।
सुमाक्षी, जिन्होंने स्कूल ऑफ द आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो (एसएआईसी) से एमएफए और महाराजा सयाजिराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा (एमएसयू, बड़ौदा) से बीएफए की उपाधि प्राप्त की है, शिक्षा, अध्यापन और कला परियोजनाओं के लिए कई शहरों में रह चुकी हैं।
उन्होंने कहा, "मैं दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, मद्रास, कानपुर, बड़ौदा में रह चुकी हूं। मैं शिकागो, इटली और फ्रांस में भी रही हूं, लेकिन मैं जहां भी रही, साल दर साल यह (दिल्ली वाला घर) ही एकमात्र स्थिर चीज रही। इसलिए, इसने हमेशा हमें जीवन में स्थायित्व का एहसास दिलाया।"
सुमाक्षी ने बताया,'' पैदा होने के बाद मुझे उसी घर में लाया गया था। मुझे उस घर की जो सबसे पहली स्मृति है वो बागीचे में बैठकर नानी से कढाई और बुनाई सीखने की है। और इसीलिए मैंने अपनी अपनी यादों के उस घर को धागे से बुनने का फैसला किया।''
उन्होंने बताया,"मेरी 'नानी' जी, जिनके पिता रेलवे में थे, क्वेटा, कैंपबेलपुर, लाहौर और कराची जैसे कई शहरों में रही थीं, जबकि मेरे 'नाना' जी एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) से थे। मेरी 'दादी' लाहौर के पास से थीं, जबकि मेरे 'दादा' फगवाड़ा, भारत से थे।"
उन्होंने आगे कहा, "मेरे 'नाना' और 'नानी' की शादी आजादी से कुछ महीने पहले 12 मई, 1947 को सीमा के पास फिरोजपुर में हुई थी।"
भाषा प्रशांत नरेश
नरेश
2505 1750 दिल्ली