प्रशासनिक निर्णय लेने में देरी लोगों को उनके वैध हितों से वंचित करने के समान है : राष्ट्रपति मुर्मू
माधव
- 20 May 2026, 07:04 PM
- Updated: 07:04 PM
नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) प्रशासनिक निर्णय लेने में देरी को लोगों को उनके वैध हितों से वंचित करने के समान करार देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बुधवार को यहां कहा कि निर्णय लेने से बचना किसी भी तरह से नैतिकता नहीं है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2024 बैच के अधिकारियों के एक समूह को संबोधित करते हुये राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि नैतिकता और सुशासन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
राष्ट्रपति ने कहा, ''अधिकारियों को ईमानदार एवं नैतिक होना चाहिए। लेकिन, इसके साथ ही आपको परिणाम भी देने होंगे। आईएएस अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे उन्हें सौंपे गए अधिकारों का इस्तेमाल करें।''
उन्होंने कहा, ''राष्ट्रपति ने कहा कि निर्णय लेने से बचना नैतिकता नहीं है बल्कि, जनहित और स्थापित व्यवस्था के अनुरूप सही निर्णय लेना ही नैतिकता का सच्चा सार है। जिस प्रकार न्याय मिलने में देरी को न्याय से वंचित करना माना जाता है, उसी प्रकार प्रशासनिक निर्णय लेने में देरी भी लोगों को उनके वैध हितों से वंचित करने के समान है।''
उन्होंने पूर्व उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल का उल्लेख करते हुए कहा कि शासन व्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में आज भी स्वतंत्रता-पूर्व काल की कुछ पुरानी प्रथाओं और चलन के तत्व मौजूद हैं।
राष्ट्रपति ने कहा, ''इस तरह की व्यवस्था को निश्चित रुप से व्यवस्था से हटाना चाहिये। आपको इस राष्ट्रीय लक्ष्य में योगदान देना होगा।"
आईएएस प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए पटेल ने 1947 में कहा था, "यह आपका परम कर्तव्य होगा कि आप भारत के आम नागरिकों के साथ अपने जैसा व्यवहार करें, या सही रूप में कहें तो स्वयं को उन्हीं में से एक मानें और उनके बीच रहें…।"
राष्ट्रपति ने कहा कि "मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए चल रहे हमारे राष्ट्रीय प्रयासों के संदर्भ में यह कथन विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है।"
राष्ट्रपति ने अधिकारियों से कहा कि यथास्थिति को स्वीकार करना अक्सर सबसे सुविधाजनक विकल्प हो सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि सबसे अच्छा विकल्प भी हो।
उन्होंने कहा कि यह पहचानना कि कब बदलाव की आवश्यकता है और उसे लागू करने के लिए दृढ़ निश्चय, क्षमता और साहस रखना ही एक प्रभावी लोक सेवक की पहचान है।
उन्होंने कहा कि बहती धारा के साथ बस बहते चले जाने के लिए किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने कहा कि 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने और हमारे समाज को प्रगति के शिखर तक पहुंचाने के लिए अधिकारियों को अक्सर विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना होगा।
मुर्मू ने अधिकारियों को सलाह दी, ''वे भारत की जनता, विशेषकर समाज के वंचित वर्गों को, अपने विचारों और कार्यों के केंद्र में रखें, चाहे वे क्षेत्र में हों या कार्यालय में। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वे विकसित और समावेशी भारत के निर्माण में अमूल्य योगदान देंगे।''
राष्ट्रपति ने कहा कि अधिकारियों की निष्पक्षता उनकी न्यायसंगतता का सूचक होगी।
उन्होंने कहा, ''आपकी संवेदनशीलता समावेशिता के प्रति आपकी प्रतिबद्धता का मापदंड होगी। आपकी विश्वसनीयता, आपकी पारदर्शिता निरंतर निष्पादन पर आधारित होगी। आपकी व्यक्तिगत और व्यावसायिक आचरण से निर्धारित आपकी सत्यनिष्ठा आपको जनहित में निर्णायक कार्रवाई करने का नैतिक साहस प्रदान करेगी।''
मुर्मू ने कहा, ''अधिकारियों को करुणा और तर्कसंगतता का मिश्रण करना होगा। आपको भावुक हुए बिना संवेदनशील होना होगा। आपको नियमों का पालन करना होगा, लेकिन व्यापक उद्देश्यों को भूलना नहीं होगा।''
उन्होंने कहा कि अब जब देश विकास के उच्च स्तर पर पहुंच चुका है, तो अधिकारियों से अपेक्षाएं भी अधिक हैं।
मुर्मू ने कहा, ''कई अवसरों पर आप विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञों की टीमों का नेतृत्व करेंगे। इसलिए, आपके सीखने का दायरा और गति बहुत व्यापक तथा त्वरित होनी चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों और परिस्थितियों के अनुकूल ढलने की आपकी क्षमता असाधारण होनी चाहिए।''
राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र का उद्देश्य जनता की आकांक्षाओं को साकार करना है।
उन्होंने कहा, ''ये आकांक्षाएं उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से व्यक्त की जाती हैं। इसलिए, अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे जनता के हित में इन प्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए मुद्दों को प्राथमिकता दें।''
राष्ट्रपति से मुलाकात करने आये ये सभी आईएएस अधिकारी वर्तमान में विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में सहायक सचिव के रूप में कार्यरत हैं।
भाषा रंजन रंजन माधव
माधव
2005 1904 दिल्ली