कर्नाटक में नेतृत्व संकट के बीच कांग्रेस सरकार ने तीन साल पूरे किए
दिलीप
- 20 May 2026, 06:54 PM
- Updated: 06:54 PM
बेंगलुरु, 20 मई (भाषा) कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने बुधवार को अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे किए, लेकिन यह जश्न नेतृत्व को लेकर उलझन के बीच फीका पड़ गया। मुख्यमंत्री बदलने की संभावित चर्चा ने सरकार की उपलब्धियों को पीछे छोड़ दिया और पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष को और तेज कर दिया।
पार्टी के भीतर इस बात की प्रबल संभावनाएं हैं कि कांग्रेस आलाकमान जल्द ही नेतृत्व परिवर्तन और राज्य मंत्रिमंडल में बहुप्रतीक्षित फेरबदल पर निर्णय ले सकता है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि केरल में सरकार गठन की प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है।
इस बात की अधिक संभावना है कि कांग्रेस आलाकमान जल्द ही मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और उपमुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार को नयी दिल्ली बुलाकर मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी कथित संघर्ष पर सौहार्दपूर्ण तरीके से चर्चा कर समाधान निकाल सकता है।
दरअसल, सरकार ने अपने तीन साल पूरे होने की पूर्व संध्या पर मंगलवार को एक भव्य 'साधना समावेश' (उपलब्धियों का सम्मेलन) का आयोजन किया था, ताकि अपनी उपलब्धियों को जनता के सामने रखा जा सके।
इस कार्यक्रम में सिद्धरमैया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, विकास का 'गुजरात मॉडल' खोखला था, जबकि कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित 'कर्नाटक मॉडल' अधिक बेहतर है।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने 1.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कल्याणकारी गारंटी योजनायें लागू की हैं, साथ ही विकास कार्य और व्यवस्थागत सुधार भी किए हैं। उन्होंने तुमकुरु जिले में 682 करोड़ रुपये से अधिक की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया।
हालांकि, हाल ही में दो विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में मिली जीत ने सत्तारूढ़ पार्टी को बड़ी राहत दी, लेकिन अंदरूनी गुटबाजी ने इस उपलब्धि के रंग में भंग डाल दिया।
मुस्लिम समुदाय में असंतोष सामने आने के बाद, पार्टी के कुछ मुस्लिम नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन्हें सिद्धरमैया का करीबी माना जाता है। उन पर आरोप था कि उन्होंने दावणगेरे दक्षिण में आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ काम किया।
यहां तक कि जब सिद्धरमैया ने देवराज उर्स का रिकॉर्ड तोड़ते हुए राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया और 17 बार राज्य का बजट पेश कर एक और उपलब्धि हासिल की, तब भी उनके कार्यकाल की स्थिरता को लेकर उठते सवालों ने इन उपलब्धियों पर पानी फेर दिया।
शिवकुमार के समर्थक लगातार उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं और वे इसके लिए सिद्धरमैया के साथ हुए उस कथित सत्ता-साझेदारी समझौते का हवाला दे रहे हैं, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि यह 2023 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की जीत के समय हुआ था।
सत्तारूढ़ दल के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान उस समय और तेज हो गई, जब 20 नवंबर 2025 को कांग्रेस सरकार द्वारा अपने पांच साल के कार्यकाल का आधा समय (ढाई साल) पूरा करने के बाद मुख्यमंत्री पद पर संभावित बदलाव को लेकर अटकलें तेज हो गईं।
इन अटकलों को 2023 में सरकार गठन के समय सिद्धरमैया और शिवकुमार के बीच हुए कथित सत्ता-साझेदारी समझौते की खबरों से और हवा मिली।
हालांकि, सिद्धरमैया कई बार यह कह चुके हैं कि वह पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि वह पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसले का पालन करेंगे।
वहीं, शिवकुमार ने भी लगातार यही रुख अपनाया है कि वह कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय के अनुसार चलेंगे और समय ही बताएगा कि मुख्यमंत्री पद के मुद्दे का क्या परिणाम निकलता है।
पार्टी के एक नेता के अनुसार, नेतृत्व परिवर्तन का फैसला अचानक नहीं लिया जाएगा। केंद्रीय नेतृत्व विभिन्न पहलुओं को देखते हुए और पार्टी के अलग-अलग वर्गों से विचार-विमर्श करके इस पर निर्णय ले सकता है, ठीक वैसे ही जैसे केरल में मुख्यमंत्री चयन के समय प्रक्रिया अपनाई गई थी।
नेतृत्व यह भी आकलन करेगा कि दोनों नेताओं का पार्टी और जनता के बीच कितना प्रभाव और समर्थन है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, जहां सिद्धरमैया मंत्रिमंडल में फेरबदल के पक्ष में हैं, वहीं शिवकुमार चाहते हैं कि पार्टी पहले नेतृत्व के मुद्दे पर निर्णय ले।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि यदि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व मंत्रिमंडल में फेरबदल को मंजूरी देता है, तो इसका यह संकेत माना जाएगा कि मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धरमैया पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा करेंगे, जिससे शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है।
पार्टी के कई नेताओं ने चिंता जताई है कि नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद शासन-प्रशासन को प्रभावित कर रहा है और कांग्रेस सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।
उन्होंने खुलकर मांग की है कि केंद्रीय नेतृत्व इस मुद्दे का समाधान पार्टी के 2028 के विधानसभा चुनावों में संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए जल्द करे।
सोमवार को मंत्री के. जे. जॉर्ज के आवास पर मल्लिकार्जुन खरगे, सिद्धरमैया और डी. के. शिवकुमार के बीच हुई बैठक के बाद इस बात की अटकलें प्रबल हो गई हैं कि आने वाले दिनों में नेतृत्व को लेकर चर्चाएं और अधिक तेज हो सकती हैं।
भाषा रंजन दिलीप
दिलीप
2005 1854 बेंगलुरु