न्यायालय ने विमान किरायों को तर्कसंगत बनाने और केंद्र से लोगों को राहत देने को कहा
नरेश
- 15 May 2026, 05:18 PM
- Updated: 05:18 PM
नयी दिल्ली, 15 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि विमान किरायों को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए और उसने केंद्र सरकार से यात्रियों को राहत प्रदान करने को कहा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि एक ही दिन, एक ही हवाई मार्ग पर उड़ान भरने वाली एक एयरलाइन एक निश्चित किराया वसूलती है जबकि दूसरी एयरलाइन अलग किराया वसूलती है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पीठ ने कहा, ''इस विसंगति के कारण लोगों को कुछ राहत देने की कोशिश करें। एक ही दिन, एक ही मार्ग पर चलने वाली उड़ानों के लिए, एक एयरलाइन 'इकोनॉमी' श्रेणी के लिए 8000 रुपये लेती है जबकि दूसरी एयरलाइन 18000 रुपये किराया लेती है।''
न्यायमूर्ति मेहता ने कहा, ''विमान किरायों को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए।'' इसके बाद सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि 2024 का एक नया अधिनियम लागू हो गया है और संबंधित नियमों पर परामर्श की प्रक्रिया जारी है।
मेहता ने कहा कि सरकार इस समस्या पर विवाद नहीं कर रही है और इस मुद्दे को गैर-विवादास्पद मानते हुए इसके सभी पहलुओं पर विचार कर रही है।
पीठ सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में देश में निजी एयरलाइनों के विमान किरायों और अन्य शुल्कों में ''अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव'' को सुव्यवस्थित करने संबंधी नियामक दिशानिर्देशों का अनुरोध किया गया था।
लक्ष्मीनारायणन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रविंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि विमान अधिनियम 1937 के तहत नियम पहले से ही मौजूद हैं, लेकिन समस्या यह है कि उनका पालन नहीं किया गया।
मेहता ने इस बात पर सहमति जताई कि पुराने नियम अभी भी लागू हैं, लेकिन भारतीय वायुयान अधिनियम 2024 के तहत नए नियम बनाए जा रहे हैं, जो जनवरी 2025 में लागू हुआ था।
श्रीवास्तव ने कहा कि जब तक नये नियम नहीं बन जाते, पुराने नियम लागू रहेंगे और इसमें कहा गया है कि यदि डीजीसीए इस बात से संतुष्ट है कि किसी विशेष स्थिति में, एयरलाइन अनुचित या अत्यधिक किराया वसूल रही हैं, तो वह निर्देश जारी करेगा।
उन्होंने कहा, 'वे कोई निर्देश जारी नहीं कर रहे हैं। नियम मौजूद हैं, शक्तियां भी मौजूद हैं, लेकिन यह शक्तियों के प्रयोग न करने का मामला है।''
पीठ ने श्रीवास्तव से केंद्र द्वारा दायर हलफनामे का जवाब देने को कहा और सॉलिसिटर जनरल के इस कथन को दर्ज किया कि नयी व्यवस्था के तहत नियम बनाने के लिए परामर्श प्रक्रिया जारी है।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 13 जुलाई तय की।
उच्चतम न्यायालय ने देश में निजी एयरलाइनों के विमान किरायों और अन्य शुल्कों में ''अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव'' को सुव्यवस्थित करने संबंधी नियामक दिशानिर्देशों का अनुरोध करने वाली एक याचिका पर हलफनामा दाखिल नहीं करने को लेकर 30 अप्रैल को केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी।
पीठ ने केंद्र को एक अर्जी के साथ हलफनामा दाखिल करने को कहा था, जिसमें शपथ पत्र दाखिल न करने की वजह और इसके लिए अतिरिक्त समय मांगने के कारणों का उल्लेख किया जाए।
पिछले साल 17 नवंबर को, शीर्ष न्यायालय ने लक्ष्मीनारायणन की याचिका पर केंद्र और अन्य पक्षों से जवाब मांगा था। लक्ष्मीनारायणन ने नागर विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले एक सशक्त और स्वतंत्र नियामक का अनुरोध किया था।
केंद्र ने 23 फरवरी को उच्चतम न्यायालय को बताया था कि नागर विमानन मंत्रालय याचिका में उठाए गए मुद्दों पर तत्परता से विचार कर रहा है।
न्यायालय ने 19 जनवरी को मामले की सुनवाई करते हुए विमान किरायों में होने वाले ''अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव'' में हस्तक्षेप करने की बात कही थी और त्योहारों के दौरान होने वाली अत्यधिक वृद्धि पर चिंता जताई थी।
न्यायालय ने विमानन कंपनियों द्वारा विमान किरायों में की गई अत्यधिक वृद्धि को ''शोषण'' करार दिया था और केंद्र सरकार तथा नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) से याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा था।
याचिका में दावा किया गया था कि सभी निजी एयरलाइनों ने बिना किसी ठोस कारण के 'इकोनॉमी' श्रेणी के यात्रियों के लिए नि:शुल्क 'चेक-इन' सामान की सीमा 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम कर दी और ऐसा कर पूर्व में टिकट के अंतर्गत आने वाली सेवा को राजस्व का एक नया स्रोत बना दिया गया।
याचिका में कहा गया है कि 'चेक-इन' के तहत केवल एक सामान की अनुमति देने की नयी नीति और इस सेवा का लाभ न उठाने वाले यात्रियों को किसी भी प्रकार की छूट, मुआवजा या लाभ न देना मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
इसमें दावा किया गया है कि वर्तमान में, किसी भी प्राधिकरण को विमान किराये या अन्य शुल्कों की समीक्षा करने या उन पर सीमा लगाने का अधिकार नहीं है, जिसके चलते एयरलाइंस छिपे हुए शुल्कों और अप्रत्याशित मूल्य निर्धारण के माध्यम से उपभोक्ताओं का शोषण कर रही हैं।
भाषा
देवेंद्र नरेश
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