अदालत ने प्रधानमंत्री, आरएसएस के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में राहत देने से किया इनकार
आशीष
- 07 May 2026, 11:39 PM
- Updated: 11:39 PM
प्रयागराज, सात मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खिलाफ राष्ट्र विरोधी और आपत्तिजनक पोस्ट करने के आरोपी दो व्यक्तियों को राहत देने से इनकार कर दिया।
इन आरोपियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मुकदमा और आरोप पत्र रद्द करने का अनुरोध करते हुए याचिका दायर की थी।
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने सोनभद्र के जुबैर अंसारी और इजहार आलम द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि इन आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप की प्रथम दृष्टया पुष्टि हुई है क्योंकि निचली अदालत ने इन अपराधों को संज्ञान में लिया है।
अदालत ने कहा कि आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो पिछले 100 वर्षों से अपनी सहायक इकाइयों के साथ समाज के विभिन्न वर्गों की सेवाएं करता रहा है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश की अधिकांश जनता ने चुना है। फेसबुक पर याचिकाकर्ताओं द्वारा की गई पोस्ट के जरिए धार्मिक भावनाएं भड़काने का जानबूझकर प्रयास किया गया।
आरोपी समाज में कथित तौर पर वैमनस्य बढ़ाने और अपने बयानों से अशांति फैलाने के लिए बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमे का सामना कर रहे हैं। आरोप है कि इन व्यक्तियों के फेसबुक एकाउंट में लगभग हर पोस्ट राष्ट्र विरोधी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं आरएसएस के खिलाफ है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किलों को परेशान करने की मंशा से प्राथमिकी दर्ज कराई गई। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने कहा कि निचली अदालत में मुकदमा चलने देना चाहिए।
इन दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि लोग अपने कार्य का परिणाम समझे बगैर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कभी कभी हद पार कर जाते हैं।
अदालत ने कहा, "लोगों के लिए कुछ मुद्दों पर एक साथ आना और विचार व्यक्त करना बहुत आसान हो गया है, वहीं कभी कभी सोशल मीडिया का दुरुपयोग किया जाता है जहां लोग ऐसी टिप्पणियां करते हैं जिनसे दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है।"
अदालत ने कहा, "2012 में सोशल मीडिया के दुरुपयोग के शुरुआती मामलों में से एक मामला सरकार के संज्ञान में आया जिसमें भूकंप पीड़ितों की बदली गई तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए। शरारती तत्व यह दिखाने के लिए कि ये महिलाएं असम और बर्मा में दंगों से पीड़ित मुस्लिम महिलाएं हैं, तस्वीरों को बदल रहे थे।''
अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया के जरिये अश्लील वीडियो, नाबालिग बच्चों की आसान पहुंच में होती हैं। इन दिनों इंटरनेट के जरिए चीजों तक पहुंच इतनी आसान हो गई है कि प्रतिबंध की रेखा खींचना कठिन है।
अदालत ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196(1)ए उस फेसबुक पोस्ट पर लागू होती है जिसमें विषयवस्तु जानबूझकर धर्म, नस्ल, जन्म स्थान, आवास, भाषा, जाति या समुदाय के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्यता, घृणा फैलाने वाली हो।
अदालत ने कहा, "इस धारा के तहत यदि एक पोस्ट सार्वजनिक सद्भाव में बाधा उत्पन्न करती है तो वह संज्ञेय अपराध (जिसमें पुलिस प्राथमिकी दर्ज कर सकती है और बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है) की श्रेणी में आती है।"
रिकॉर्ड में दर्ज सामग्री पर विचार करते हुए अदालत ने 29 अप्रैल के अपने निर्णय में कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि इन आरोपियों के खिलाफ अपराध का कोई मामला नहीं बनता।
भाषा सं राजेंद्र आशीष
आशीष
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