पारसी महिलाओं को अंतरधार्मिक विवाह पर बहिष्कृत करना भेदभावपूर्ण: शीर्ष अदालत
माधव
- 05 May 2026, 10:00 PM
- Updated: 10:00 PM
नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि अंतरधार्मिक विवाह करने पर पारसी महिलाओं का धार्मिक बहिष्कार प्रथम दृष्टया भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत अंत:करण का अधिकार जन्म से प्राप्त होता है और इसे विवाह के आधार पर छीना नहीं जा सकता।
इस पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रशांत बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी।
संविधान पीठ यह भी विचार कर रही है कि क्या किसी धार्मिक समुदाय के प्रमुख को सदस्यों का धार्मिक बहिष्कार करने का अधिकार, अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्ति के धर्म को मानने और उसका पालन करने के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
सुनवाई के दौरान, एक पारसी महिला की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने कहा कि ऐसा करना कानून की दृष्टि से गलत है। महिला ने एक हिंदू पुरुष से शादी की थी, लेकिन अंतरधार्मिक विवाह के कारण पारसी समुदाय से बहिष्कृत किए जाने की सजा का सामना कर रही थी।
अधिवक्ता ने कहा, ''मैं (महिला याचिकाकर्ता) एक भक्त हूं, मैंने अपना धर्म नहीं छोड़ा है, मैं एक आस्थावान व्यक्ति हूं। महज इसलिए कि मैंने हिंदू पुरुष से शादी की है (मुझे बहिष्कृत किया गया है), यह (अंतरधार्मिक विवाह) कोई अपराध नहीं है।''
उन्होंने यह भी कहा कि यह एक प्रगतिशील और महान धर्म पर मानव द्वारा थोपा गया प्रतिबंध है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि विवाह भेदभाव का आधार तभी हो सकता है जब कोई महिला किसी दूसरे धर्म के पुरुष से विवाह करे। पीठ ने टिप्पणी की कि इस तरह के चयनात्मक बहिष्कार का प्रभाव भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
उन्होंने टिप्पणी की, ''अनुच्छेद 25(1) के तहत अंत:करण का अधिकार जन्मजात अधिकार है और इसे विवाह द्वारा छीना नहीं जा सकता। इस मामले में, वर्गीकरण के आधार पर विवाह, महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण है।''
खंबाटा ने कहा, ''यही सिद्धांत पुरुष पर लागू नहीं होता। (जबकि) यह दोनों पक्षों पर लागू होना चाहिए।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ''इससे न केवल ज़ोरोएस्ट्रियन पर, बल्कि सभी पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।''
उन्होंने आगे टिप्पणी की कि पारसी पिताओं की संतानें जन्म के आधार पारसी धर्म का लाभ उठाती हैं। उन्होंने कहा, ''यही बात पत्नी पर भी लागू होनी चाहिए। यह जन्म से प्राप्त धर्म है; इसे विवाह से छीना नहीं जा सकता।''
खंबाटा ने यह भी दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार, अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने और अपनी अंतरात्मा के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता से अधिक व्यापक नहीं हैं।
उन्होंने जोर देते हुए कहा, "दोनों प्रावधानों को सामंजस्यपूर्ण तरीके से पढ़ा जाना चाहिए।"
सुनवाई निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी और बुधवार को भी जारी रहेगी।
संविधान पीठ को संदर्भित करने का निर्णय पांच-सदस्यीय पीठ ने लिया था। यह संदर्भ 1962 के बम्बई उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें बहिष्कार की शक्ति को एक संरक्षित धार्मिक प्रथा के रूप में सही ठहराया गया था।
भाषा सुरेश माधव
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