असम: विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद अस्तित्व के संकट से जूझ रहा विपक्ष
मनीषा
- 05 May 2026, 12:05 PM
- Updated: 12:05 PM
गुवाहाटी, पांच मई (भाषा) असम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को मिले भारी जनादेश ने विपक्ष को हाशिये पर ला दिया है और हाल के समय में अपने सबसे खराब प्रदर्शन के साथ वह अपनी प्रासंगिकता के लिए संघर्ष कर रहा है।
असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में राजग को रिकॉर्ड 102 सीट मिलीं, जिनमें से 82 सीट भाजपा के खाते में गईं । इस प्रकार भाजपा ने राज्य में पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल किया।
दूसरी ओर, छह दलों के गठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस और रायजोर दल को क्रमशः 19 और दो सीट मिलीं। तृणमूल कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और उनके क्रमशः एक और दो विधायक हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि जब तक भाजपा के प्रतिद्वंद्वी दल एक नया सामाजिक गठबंधन नहीं बनाते, एक विश्वसनीय असमिया चेहरा नहीं खोजते और पहचान व विकास के मुद्दों पर एक वैकल्पिक विमर्श तैयार नहीं करते, तब तक उनके 2031 तक सत्ता में आने की कोई संभावना नहीं होगी और वे बिखरे हुए विपक्ष तक ही सीमित रह सकते हैं।
छह दलों के गठबंधन के सदस्यों को अपनी रणनीति, नेतृत्व और प्रासंगिकता को लेकर सवालों का सामना करना पड़ेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, असम कांग्रेस प्रमुख के तौर पर गौरव गोगोई, एजेपी प्रमुख लुरिनज्योती गोगोई के तीखे बयान और अखिल गोगोई की सक्रियता के बावजूद, विपक्ष के पास हिमंत विश्व शर्मा जैसे जनाधार वाला चेहरा नहीं है।
हार अक्सर आंतरिक मतभेदों को जन्म देती है, जिसमें नेता खराब प्रदर्शन के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं। इससे इस्तीफे, नेतृत्व में बदलाव या यहां तक कि दलों में विभाजन भी हो सकता है, जो कि कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है।
कांग्रेस के लिए, उसका वर्तमान सीटों का आंकड़ा 2021 के 29 से घट गया, जबकि वह गठबंधन का नेतृत्व कर रही थी। क्षेत्रीय दलों जैसे एजेपी और रायजोर दल ने कुन्की चौधरी और ज्ञानश्री बोरा जैसे हाई-प्रोफाइल 'जेन ज़ी' चेहरों को मैदान में उतारा, लेकिन वे युवा ऊर्जा को भुनाने में सफल नहीं हो सके।
दूसरी ओर, ''भूमि, पहचान और सुरक्षा'' पर भाजपा का विमर्श, अतिक्रमण खाली कराने का अभियान, 'अवैध प्रवासियों' को वापस भेजने की कार्रवाई ने विपक्ष को कठघरे में खड़ा किया।
इसके अलावा, कांग्रेस के जो 19 उम्मीदवार जीते हैं, उनमें 18 मुस्लिम समुदाय से हैं और केवल एक हिंदू है, जिससे भाजपा को भरपूर राजनीतिक तर्क का आधार मिल गया है।
वरिष्ठ पत्रकार अमरेन्द्र डेका ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में कहा ''हार अक्सर नेतृत्व से जुड़े मुद्दों को सामने ला देती है। राज्य स्तरीय नेताओं की आलोचना इस बात के लिए की जा सकती है कि वे समर्थन जुटाने में विफल रहे या सीटों के बंटवारे में गलती हुई या चुनाव संदेश सही नहीं पहुंचा।''
उन्होंने कहा कि इस तरह की हार जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा सकती है, जिससे भविष्य के अभियानों के लिए उनका उत्साह कम हो सकता है।
डेका ने कहा, '' इस तरह के नुकसान से पार्टियों के लिए अपने संगठनात्मक ढांचे और स्थानीय स्तर पर अपनी मौजूदगी को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है, जो असम की राजनीति में बेहद अहम है। विपक्षी गठबंधन को अपने राजनीतिक विमर्श पर फिर से विचार करना होगा।''
असम में 2016 से लगातार तीसरी बार कांग्रेस की हार और हर बार उसकी सीटों की संख्या में कमी कुछ ऐसे चुनावी असफलताएं हैं जो राज्य में विपक्ष को संगठनात्मक रूप से और जन धारणा के स्तर पर कमजोर कर सकती हैं।
भाषा शोभना मनीषा
मनीषा
0505 1205 गुवाहाटी