आबादी की जमीन पर नमाज पढ़ने की अनुमति देने से अदालत का इनकार
राजकुमार
- 02 May 2026, 08:56 PM
- Updated: 08:56 PM
प्रयागराज (उप्र), दो मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने संभल जिले के एक गांव में एक भूखंड पर नमाज अदा करने की अनुमति और सुरक्षा उपलब्ध कराने का अधिकारियों को निर्देश देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि पूर्व में अस्तित्व में नहीं रही धार्मिक व्यवस्था शुरू करने या उसका विस्तार करने को अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है खासकर तब जब इससे मौजूदा सामाजिक संतुलन बिगड़ता हो।
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने कहा कि जहां इस तरह की गतिविधि से जनजीवन प्रभावित होने की संभावना हो, वहां राज्य सरकार को कार्रवाई के लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं है और वह उचित निवारक उपाय कर सकती है।
संभल के असीन नामक एक व्यक्ति ने उपहार विलेख पर आधारित उस संपत्ति का स्वामी होने का दावा करते हुए दलील दी कि अधिकारी इस तरह की प्रार्थना करने से रोक रहे हैं और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने दावा किया कि विवादित भूमि, राजस्व में आबादी की जमीन के तौर पर दर्ज है जो सार्वजनिक उपयोग के लिए है और इस पर याचिकाकर्ता का कोई स्वामित्व अधिकार नहीं है।
पीठ को अवगत कराया गया कि उक्त स्थान पर ईद के मौके पर ही परंपरागत तौर पर नमाज अदा की जाती रही है और इस स्थापित व्यवस्था पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है।
पीठ को यह भी बताया गया कि लेकिन याचिकाकर्ता गांव के बाहर से भारी संख्या में लोगों को नमाज के लिए बुलाकर इसे नियमित व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रहा है।
सरकारी वकील ने पीठ से कहा कि धार्मिक व्यवस्थाओं का सम्मान किया जाना सही है, लेकिन किसी नई परंपरागत गतिविधियां शुरू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थापित व्यवस्था का पालन किया जाना आवश्यक है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा, "सार्वजनिक भूमि आम उपयोग के लिए होती है और कोई भी व्यक्ति या समूह इसका उपयोग विशेष या नियमित धार्मिक स्थल के तौर पर करने का दावा नहीं कर सकता।"
अदालत ने कहा, "धर्म का पालन करने का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है जिसमें पहुंच, आवागमन और शांतिपूर्ण जीवन शामिल है एवं इसे दूसरों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने के तौर पर नहीं किया जा सकता।"
अदालत ने इस बात जोर दिया कि धर्म पालन का अधिकार एक असीमित अधिकार नहीं है और इसका इस्तेमाल इस तरह से करना होगा कि इससे दूसरे लोग प्रभावित ना हों या सामान्य जनजीवन बाधित ना हो।
भाषा सं राजेंद्र
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