धार्मिक गतिविधि के नाम पर रास्ता बंद नहीं कर सकते, सरकार दे सकती है दखल: न्यायालय
सुरेश
- 28 Apr 2026, 09:01 PM
- Updated: 09:01 PM
नयी दिल्ली, 28 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है। इसने यह भी कहा कि किसी भी धार्मिक समुदाय को पूजा-पाठ करने के तरीके में स्वायत्तता है और अदालत उसके धार्मिक मामलों में फैसला नहीं सुना सकती है, लेकिन अगर किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि पर असर पड़ रहा है, तो सरकार अपने अधिकारों से हस्तक्षेप कर सकती है।
नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।
संविधान पीठ में भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
सुनवाई के नौवें दिन, शीर्ष अदालत में हिंदू धर्म आचार्य सभा का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता अक्षय नागराजन ने कहा कि सरकार अनुच्छेद 25(2)(ए) के तहत आधारों का हवाला देकर किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
नागराजन ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण केवल धार्मिक विश्वास के मामलों तक ही सीमित नहीं है और यह आस्था की बाहरी अभिव्यक्तियों तक भी समान रूप से विस्तारित है, जिसमें किसी विशेष देवता की पूजा से जुड़े अनुष्ठान, पालन, समारोह और प्रथाएं शामिल हैं।
इन दलीलों के आधार पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यदि कोई धर्मनिरपेक्ष गतिविधि धार्मिक गतिविधियों से प्रभावित होती है तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।
उन्होंने कहा, ''मान लीजिए कि कोई मंदिर है और वह वार्षिक उत्सव मनाना चाहता है, जैसे कि वार्षिक रथ यात्रा उत्सव। आप मंदिर के चारों ओर की सभी सड़कों को अवरुद्ध नहीं कर सकते। इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। आप अपनी धार्मिक गतिविधियां कर सकते हैं, लेकिन सड़कों को अवरुद्ध करके नहीं। राज्य हमेशा हस्तक्षेप करके नियमों का पालन करवा सकता है।"
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यद्यपि न्यायालय किसी संप्रदाय के धार्मिक मामलों पर निर्णय नहीं दे सकता, क्योंकि संविधान के तहत उस संप्रदाय को स्वायत्तता दी गई है, लेकिन जब धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो सरकार हमेशा हस्तक्षेप कर सकती है।
उन्होंने कहा, "मान लीजिए कि वे कहते हैं कि उनकी पूजा का एक विशेष तरीका है। पूजा के तरीके में यही स्वायत्तता दी गई है। न्यायालय फैसला सुनाकर यह नहीं कह सकता कि नहीं, ऐसा नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर इससे किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि पर भी असर पड़ता है, तो सरकार हस्तक्षेप करके नियमन कर सकती है।"
नागराजन ने दलील दी कि अनुच्छेद 26(डी) के तहत धर्मनिरपेक्ष अधिकारों का ध्यान रखा जा सकता है।
संविधान का अनुच्छेद 26(डी) धार्मिक समुदायों को कानून के अनुसार अपनी चल और अचल संपत्तियों का प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान करता है।
सुनवाई के दौरान, अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि पिछले 2,000 वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों के कारण "भारत" 25 टुकड़ों में विभाजित हो गया और पिछले 200 वर्षों में, यह सात देशों में विभाजित हो गया।
उन्होंने दलील दी कि अंग्रेजी भाषा की सीमाओं के कारण "संविधान" के लिए अंग्रेजी में कोई उचित शब्द नहीं है, क्योंकि संस्कृत में 52 अक्षरों की तुलना में केवल 26 अक्षर हैं।
इस मौके पर न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा, "आप उस विषय से भटक रहे हैं जिसपर हम सभी चर्चा कर रहे हैं। आपने कहा कि संस्कृत में 52 अक्षर हैं। इसी प्रकार, तमिल में 247 अक्षर हैं। इन सब विषयों में न जाएं। केवल मुख्य मुद्दे पर ही ध्यान दें।"
इससे पहले दिन में उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसके संचालन के लिए कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती। न्यायालय ने कहा कि ऐसी संस्थाओं के कामकाज के लिए एक व्यवस्था एवं नियम होने चाहिए।
हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी वंश के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि दरगाह वह स्थान होता है, जहां किसी संत को दफनाया गया हो।
पाशा ने कहा, ''इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है।''
उन्होंने कहा, ''भारत में सूफी आस्था प्रणाली में चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दिया सहित कई प्रमुख परंपराएं शामिल हैं। मौजूदा मामला चिश्तिया व्यवस्था से जुड़ा है। मेरा कहना है कि यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से एक धार्मिक संप्रदाय है। अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को देखा जाए, तो उनमें रोजा, नमाज, हज, जकात और सबसे बढ़कर आस्था जैसी इस्लामी परंपराओं के पालन पर जोर है।''
पाशा ने दलील दी कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है।
इसपर न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा, ''अराजकता नहीं हो सकती। चाहे दरगाह हो या मंदिर, संस्था से जुड़े तत्व होंगे, धार्मिक क्रियाओं का एक तरीका होगा और कार्यों के संपादन का क्रम होगा। किसी न किसी को इसे विनियमित करना होगा।''
उन्होंने कहा, ''ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई कहे कि मैं जो चाहूंगा, वह करुंगा या द्वार हर समय बिना किसी नियंत्रण के खुले रहें। इसलिए सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाला निकाय कौन है। यहीं संरक्षण की बात आती है, क्योंकि विनियमन आवश्यक है। साथ ही, यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता। व्यापक संवैधानिक मानकों पर भेदभाव नहीं हो सकता।''
न्यायमूर्ति अमानुल्ला ने कहा कि हर संस्था के लिए नियम होने चाहिए और इसे प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता।
मामले में सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
भाषा प्रशांत सुरेश
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