केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को लिखा पत्र, कहा: न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए
सुरेश
- 27 Apr 2026, 06:04 PM
- Updated: 06:04 PM
नयी दिल्ली, 27 अप्रैल (भाषा) आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर कहा है कि आबकारी मामले में न तो वह व्यक्तिगत रूप से और न ही वकील के मार्फत से उनके समक्ष पेश होंगे। पार्टी ने सोमवार को यह जानकारी दी।
केजरीवाल ने चार पन्नों के इस पत्र में ''न्याय नहीं मिलने'' की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस मामले को लेकर उनकी ''गंभीर'' चिंताएं हैं।
बाद में केजरीवाल ने 'एक्स' पर एक वीडियो संदेश पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई ''जीत या हार के बारे में नहीं है, बल्कि सही और गलत के बारे में है।''
उन्होंने यह भी कहा कि वह इस मामले में न्यायमूर्ति शर्मा द्वारा पूर्व में दिये गए आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जाने की तैयारी कर रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, ''लोग मुझसे पूछ सकते हैं कि यदि मैं मामले की सुनवाई से खुद को अलग नहीं करने संबंधी उनके आदेश से खुश नहीं हूं, तो मैं उच्चतम न्यायालय क्यों नहीं जाता? मैं उसके लिए तैयारी कर रहा हूं, यह बहुत संवेदनशील मामला है।''
केजरीवाल ने वीडियो में कहा, ''कानून, सम्मान और न्यायपालिका में जनता के भरोसे को ध्यान में रखते हुए, मैं एक बार में एक ही कदम उठा रहा हूं। मैं यह कदम अहंकार, विद्रोह या न्यायपालिका के अपमान के तौर पर नहीं उठा रहा हूं।''
उन्होंने पत्र में लिखा, ''मैंने तय किया है कि इस मामले में आगे की कार्यवाही में मैं भाग नहीं लूंगा, न तो व्यक्तिगत रूप से, न ही वकील के मार्फत।''
केजरीवाल ने पत्र में लिखा, ''न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।''
उन्होंने कहा, ''यह सिद्धांत लोकतंत्र में न्यायालय द्वारा नागरिक को दी जाने वाली सबसे मूलभूत गारंटियों में से एक है।''
पत्र में महात्मा गांधी के दिखाये रास्तों और सत्याग्रह के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए केजरीवाल ने कहा कि उनका मकसद ''न्यायपालिका को मजबूत करना और उसे कमजोर होने से बचाना'' है।
आप प्रमुख ने दावा किया कि न्यायमूर्ति शर्मा को मामले की सुनवाई से अलग किये जाने संबंधी उनकी पिछली याचिका को व्यक्तिगत हमले के रूप में लिया गया। इस याचिका को 20 अप्रैल को खारिज कर दिया गया था।
उन्होंने पत्र में लिखा, ''उक्त फैसले के बाद, मुझे यह दुखद एहसास हुआ कि जिसे मैंने आशंका की एक वैध कानूनी दलील के रूप में रखा था, उसे माननीय न्यायाधीश महोदया पर व्यक्तिगत हमले और संस्था पर आक्रमण के रूप में देखा गया।''
केजरीवाल ने कहा कि इससे स्पष्ट है कि मेरी आशंका को न्यायिक दृष्टि से व्यक्तिगत और संस्थागत अपमान माना गया।
पत्र में केजरीवाल ने कहा कि अब न्यायमूर्ति शर्मा की अदालत में ''निष्पक्ष सुनवाई होना असंभव'' हो गया है।
केजरीवाल ने न्यायमूर्ति शर्मा को सुनवाई से अलग करने संबंधी याचिका में पहले बताए गए दो आधार को भी दोहराया।
उन्होंने पत्र में लिखा, ''पहला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (एबीएपी) के मंच पर बार-बार सार्वजनिक रूप से भागीदारी का मुद्दा।''
केजरीवाल ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायमूर्ति शर्मा की संतान केंद्र सरकार के कई अधिवक्ता पैनल में पेशेवर रूप से जुड़े हुए हैं।
कार्यवाही के दौरान के अपने व्यक्तिगत अनुभव को याद करते हुए दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने न्यायपालिका में जनता के भरोसे पर इस मामले के व्यापक असर को लेकर चिंता जताई और साथ ही यह भी कहा कि वह न्यायपालिका का पूरा सम्मान करते हैं।
उन्होंने लिखा, ''जब मैं अपना पक्ष रखने के लिए माननीय न्यायाधीश के सामने खड़ा था, तो मन में बस एक ही सवाल था - क्या मुझे न्याय मिलेगा? आज, यही सवाल मेरी अंतरात्मा में और गहराई तक समा गया है।''
पत्र में यह भी कहा गया कि यह मामला अब व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है, न केवल कानूनी और राजनीतिक हलकों में, बल्कि देशभर के घरों में इसपर चर्चा हो रही है।
केजरीवाल ने संभावित आलोचनाओं का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि उनके इस कदम को न्यायपालिका के विरोध के रूप में न देखा जाए।
उन्होंने लिखा, ''मुझे पता है कि कुछ लोग मुझे न्यायपालिका के 'खिलाफ' बताएंगे, लेकिन यह कैसे हो सकता है, जबकि मुझे खुद न्यायपालिका से राहत मिली है। न्यायपालिका से मुझे जमानत का आदेश भी मिला और हाल में आरोप-मुक्त भी किया गया है। आज मैं आजाद हूं तो न्यायपालिका की बदौलत।''
केजरीवाल ने कहा कि न्यायपालिका के प्रति उनका सम्मान ''अटूट'' है।
उन्होंने लिखा, ''मेरी आपत्ति उच्च न्यायालय या व्यापक न्यायिक व्यवस्था से नहीं है। आपत्ति केवल इस बात से है कि यह मामला आपके (न्यायमूर्ति शर्मा के) समक्ष ऐसे हालात में जारी है जहां गंभीर और अनसुलझे सवाल और परिस्थितियां उनके निष्पक्ष न्याय कर सकने पर जनता में गहरा संदेह पैदा कर रही हैं।''
उन्होंने कहा, ''मैं उन मामलों में पेश होता रहूंगा, जिनमें ये गंभीर और अनसुलझे मुद्दे नहीं हैं।''
केजरीवाल ने कहा कि यह फैसला उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है और वह इसके नतीजे भुगतने को तैयार हैं।
उन्होंने लिखा, ''हो सकता है कि इससे मेरे अपने कानूनी हितों को नुकसान पहुंचे। मुझे पता है कि इस माननीय अदालत के समक्ष अपनी दलीलें रखने का मौका मैं गंवा सकता हूं और गंभीर अंजाम भी भुगतने पड़ सकते हैं। मैं इसके लिए तैयार हूं।''
केजरीवाल ने कहा कि उन्होंने न्यायमूर्ति शर्मा के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखा है।
भाषा सुभाष सुरेश
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