घृणा अपराध मामला: न्यायालय ने प्राथमिकी में उचित प्रावधानों को लागू न करने पर उप्र से पूछे सवाल
संतोष
- 03 Feb 2026, 07:16 PM
- Updated: 07:16 PM
नयी दिल्ली, तीन फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि वर्ष 2021 में नोएडा में कथित घृणा अपराध के मामले में दर्ज प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के उचित प्रावधानों को क्यों नहीं लागू किया गया।
उत्तर प्रदेश की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि उन्होंने संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ छानबीन शुरू कर दी है। पीठ ने पूछा, ''क्या इससे उचित प्रावधानों के तहत मामले के पंजीकरण न होने की समस्या का समाधान हो जाता है?"
न्यायालय जुलाई 2021 में नोएडा में कथित घृणा अपराध में दुर्व्यवहार और यातना का शिकार हुए एक वरिष्ठ नागरिक की शिकायत पर निष्पक्ष जांच और सुनवाई के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि प्राथमिकी आईपीसी की धारा 153-बी और 295-ए के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दर्ज की जानी चाहिए थी।
धारा 153-बी राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक आरोपों और टिप्पणियों के अपराध से संबंधित है, वहीं धारा 295-ए किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है, जिसमें उसके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना शामिल है।
अहमदी ने आईपीसी की धारा 298 का भी हवाला दिया, जो जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से अनुचित टिप्पणी से संबंधित है।
उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं हो रही हैं और यह राष्ट्रीय एकता के लिए ठीक नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की, ''हमें इसे वह रंग नहीं देना चाहिए।''
न्यायालय ने कहा, ''यह एक व्यक्तिगत घटना है जिसके लिए आप इस अदालत में आए हैं। हमने आपकी याचिका पर सुनवाई की है और हम सरकार से कार्रवाई की अपेक्षा करते हैं। इसे यहीं खत्म करते हैं।''
सुनवाई की शुरुआत में नटराज ने पीठ को बताया कि याचिका कथित घृणा अपराध से संबंधित है और मामले की सुनवाई लंबित है।
अहमदी ने कहा कि घृणा अपराध से संबंधित आईपीसी के तहत अपराधों के लिए प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, ''राज्य के अधिकारियों की ओर से इस तथ्य को स्वीकार करने में अनिच्छा का एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई दे रहा है कि इस तरह की घटना वास्तव में घटित हुई।''
पीठ ने कहा कि उसने घृणास्पद टिप्पणियों के मुद्दे को उठाने वाली कई याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है।
पीठ ने नटराज से पूछा, ''आपने उन आरोपों के लिए मामला क्यों दर्ज नहीं किया जो लगाए गए थे?''
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह संबंधित जांच अधिकारी की गलती थी और जांच शुरू कर दी गई है।
पीठ ने कहा, "जांच शुरू करना इस सवाल का जवाब नहीं है कि अपराध क्यों दर्ज नहीं किए गए।"
पीठ ने कहा कि जब तक उचित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज नहीं किया जाता और यह जांच नहीं की जाती कि अपराध साबित हुए हैं या नहीं, तब तक मामला आगे कैसे बढ़ेगा।
नटराज ने कहा कि सबूतों के आधार पर मामले में विभिन्न अपराधों के लिए आरोप पत्र दाखिल किया गया था।
पीठ ने कहा, "थोड़ा तटस्थ होकर देखें। आप मंजूरी देने से इनकार कर सकते हैं, यह एक अलग बात है। लेकिन क्या आप प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर सकते हैं?''
जब विधि अधिकारी ने कहा कि उचित प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी, तो पीठ ने कहा, ''अभी निर्देश दीजिए।''
शीर्ष न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 196 के तहत मंजूरी का भी उल्लेख किया, जो राज्य के विरुद्ध अपराधों और ऐसे अपराध करने की साजिश के लिए अभियोजन से संबंधित है।
पीठ ने विधि अधिकारी को निर्देश प्राप्त करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया और मामले की सुनवाई 13 फरवरी को तय की।
याचिका में गौतम बुद्ध नगर जिले के कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उचित विभागीय या दंडात्मक कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया गया है, जिन पर न्यायालय के पूर्व के एक फैसले में निर्देशित निवारक और उपचारात्मक उपायों का पालन करने में विफल रहने का आरोप है।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में दावा किया कि वह नोएडा में "घृणा अपराध" के शिकार हुए थे, जहां चार जुलाई, 2021 को लोगों के एक समूह ने उनके साथ बदसलूकी की थी।
घटना का विस्तृत विवरण देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन पर हमला किया गया और उनकी "धार्मिक पहचान" से संबंधित अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया। याचिका में दावा किया गया है कि याचिकाकर्ता पर "उनकी दाढ़ी और उनके मुस्लिम होने की पहचान" के कारण हमला किया गया।
भाषा आशीष संतोष
संतोष
0302 1916 दिल्ली