केंद्र ने मरणोपरांत प्रजनन की अनुमति देने वाले आदेश के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की
गोला
- 01 Feb 2026, 12:49 PM
- Updated: 12:49 PM
नयी दिल्ली, एक फरवरी (भाषा) केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है जिसमें एक निजी अस्पताल को एक अविवाहित मृत व्यक्ति के 'फ्रीज' शुक्राणु उसके माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने केंद्र की याचिका पर मृतक के माता-पिता को नोटिस जारी किया। केंद्र ने एकल न्यायाधीश के 2024 के फैसले को चुनौती दी है जिसमें कहा गया था कि यदि शुक्राणु या अंडाणु के मालिक की सहमति साबित की जा सके तो मरणोपरांत प्रजनन के लिए इनके इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं है।
पीठ ने याचिका पर आगे की सुनवाई के लिए 27 फरवरी की तारीख तय की।
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश वकील ने कहा कि एकल न्यायाधीश का निर्णय सहायक प्रजनन एवं सरोगेसी (किराए की कोख) से जुड़े मौजूदा कानून के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि कानून में दादा-दादी को 'इन विट्रो फर्टिलाइजेशन' (आईवीएफ) और सरोगेसी के उद्देश्य से ''इच्छुक'' दंपति बनने की अनुमति देने का प्रावधान नहीं है जिसकी एकल न्यायाधीश ने अनुमति दी है।
वकील ने अदालत के सवाल पर कहा कि एकल न्यायाधीश के निर्देश के बावजूद मृतक के 'फ्रीज' किए गए शुक्राणु अब तक उसके माता-पिता को नहीं सौंपे गए हैं और इसके बाद माता-पिता की ओर से दायर अवमानना याचिका भी उच्च न्यायालय में लंबित है।
अदालत ने केंद्र से अपील दायर करने में एक साल से अधिक की देरी का कारण भी बताने को कहा।
एकल न्यायाधीश ने चार अक्टूबर, 2024 को सर गंगा राम अस्पताल को मृतक के 'फ्रीज' शुक्राणु उसके माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया था। न्यायाधीश ने यह आदेश माता-पिता की याचिका पर दिया था।
अदालत ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से इस पर विचार करने को कहा था कि मरणोपरांत प्रजनन से जुड़े मुद्दों पर कोई कानून, अधिनियम या दिशा-निर्देश की आवश्यकता है या नहीं।
मरणोपरांत प्रजनन (पीआर) से तात्पर्य एक या दोनों जैविक माता-पिता की मौत के बाद सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (एआरटी) का उपयोग कर संतान उत्पन्न करने की प्रक्रिया से है।
याचिकाकर्ताओं के बेटे ने उसके कैंसर से पीड़ित होने का पता चलने के बाद कीमोथेरेपी शुरू होने से पहले 2020 में अपने शुक्राणु के नमूने को फ्रीज करवा लिया था। चिकित्सकों ने उसे बताया था कि कैंसर का इलाज प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है इसलिए उसने जून 2020 में अस्पताल की आईवीएफ प्रयोगशाला में अपने शुक्राणु सुरक्षित रखने का फैसला किया।
एकल न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा था कि शुक्राणु का नमूना संपत्ति या संपदा होता है और किसी मृत व्यक्ति के मामले में, यह मानव शव या उसके अंगों की तरह ही व्यक्ति की जैविक सामग्री का हिस्सा है।
एकल न्यायाधीश ने इस मामले में शुक्राणु के मालिक की सहमति के बारे में कहा था कि याचिकाकर्ताओं के बेटे ने अपने शुक्राणु का नमूना सुरक्षित रखने की सहमति देते समय स्पष्ट रूप से कहा था कि वह प्रजनन क्षमता बचाने के लिए शुक्राणु फ्रीज कराने के लिए तैयार है।
भाषा
सिम्मी गोला
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