केंद्र ने वायु, जल कानूनों के तहत समान सहमति संबंधी दिशा-निर्देशों में ढील दी
प्रशांत
- 28 Jan 2026, 09:10 PM
- Updated: 09:10 PM
नयी दिल्ली, 28 जनवरी (भाषा) केंद्र सरकार ने वायु और जल प्रदूषण से निपटने से जुड़े कानूनों में निर्धारित दिशा-निर्देशों में बुधवार को संशोधन किया, जिसके तहत उद्योगों को अपने उद्यम संचालित करने के लिए दी गई सहमति तब तक वैध रहेगी, जब तक कि इसे रद्द नहीं कर दिया जाता।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में उद्योगों के लिए सहमति तंत्र को और अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिए वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 के तहत अधिसूचित समान सहमति दिशा-निर्देशों में संशोधन किया गया है।
बयान के मुताबिक, एक प्रमुख संशोधन संचालन की सहमति (सीटीओ) की वैधता से जुड़ा हुआ है।
इसमें कहा गया है, "संशोधित दिशा-निर्देशों के तहत, एक बार जारी किया गया सीटीओ तब तक वैध रहेगा, जब तक इसे रद्द नहीं कर दिया जाता। समय-समय पर निरीक्षण के जरिये पर्यावरणीय अनुपालन को सुनिश्चित करना जारी रहेगा।"
बयान में स्पष्ट किया गया है कि उल्लंघन के मामले में सहमति रद्द की जा सकती है।
इसमें कहा गया है, "यह कदम बार-बार नवीनीकरण की आवश्यकता को समाप्त कर देता है, कागजी कार्रवाई में कमी लाता है, उद्योगों पर अनुपालन का बोझ घटाता है और औद्योगिक संचालन की निरंतरता सुनिश्चित करता है। इसके अलावा, लाल श्रेणी के उद्योगों को सहमति प्रदान करने की प्रक्रिया अवधि 120 दिनों से घटाकर 90 दिन कर दी गई है।"
बयान में कहा गया है कि इस कदम से सीटीओ के नवीनीकरण में देरी के कारण होने वाली अनिश्चितता और परिचालन संबंधी व्यवधान भी दूर हो जाते हैं।
इसमें कहा गया है कि 'समेकित सहमति एवं प्राधिकरण' का प्रावधान एक महत्वपूर्ण सुधार है।
बयान के मुताबिक, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) अब एक सामान्य आवेदन पर कार्रवाई कर सकते हैं और वायु एवं जल अधिनियमों के साथ-साथ विभिन्न अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत स्वीकृति के लिए एकीकृत अनुमतियां जारी कर सकते हैं।
बयान में कहा गया है कि एकीकृत अनुमति से कई आवेदनों की आवश्यकता कम हो जाती है, अनुमोदन की समयसीमा घट जाती है और निगरानी, अनुपालन एवं रद्द करने के लिए मजबूत प्रावधान लागू रहते हैं।
इसमें कहा गया है, "संशोधनों का मकसद पर्यावरण सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) और प्रदूषण नियंत्रण समितियों (पीसीसी) को सहमति आवेदनों को संसाधित करने और निरीक्षण करने में सहायता प्रदान करना तथा अनुमोदन प्रक्रियाओं को तेज, स्पष्ट एवं अधिक कुशल बनाना है।"
पिछले साल जारी दिशा-निर्देश 'स्थापना की सहमति' (सीटीई) और सीटीओ प्रदान करने, अस्वीकार करने या रद्द करने के लिए एक समान ढांचा प्रदान करते हैं।
बयान के अनुसार, प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए संशोधित दिशा-निर्देश पर्यावरण लेखापरीक्षा नियम 2025 के तहत प्रमाणित पंजीकृत पर्यावरण लेखापरीक्षकों को साइट का दौरा करने और अनुपालन को सत्यापित करने की अनुमति देते हैं, जिससे सत्यापन को मजबूती मिलती है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उच्च जोखिम वाले उद्योगों तथा प्रवर्तन पर अधिक ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।
बयान में कहा गया है कि अधिसूचित औद्योगिक संपदाओं या क्षेत्रों में स्थित सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए विशेष प्रावधान लागू किए गए हैं।
इसमें कहा गया है कि ऐसी इकाइयों के लिए स्व-प्रमाणित आवेदन जमा करने पर सीटीई को स्वीकृत मान लिया जाता है, क्योंकि भूमि का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से पहले ही मूल्यांकन किया जा चुका होता है।
बयान में कहा गया है कि संशोधित दिशा-निर्देशों में न्यूनतम दूरी स्थल निर्धारण मानदंड की जगह स्थल-विशिष्ट पर्यावरणीय मूल्यांकन शामिल किया गया है, जिससे सक्षम अधिकारियों को जल निकायों, बस्तियों, स्मारकों और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से निकटता जैसे स्थानीय तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर उचित सुरक्षा उपाय निर्धारित करने की अनुमति मिलती है।
इसमें कहा गया है कि संशोधित दिशा-निर्देश राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को पांच से 25 वर्षों की अवधि के लिए एकमुश्त सीटीओ शुल्क निर्धारित करने की अनुमति देते हैं, जिससे बार-बार शुल्क संग्रह और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
बयान के अनुसार, शुल्क निर्धारण में अस्पष्टता को दूर करने और राज्यों में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए अनुसूची-2 में "पूंजी निवेश" की एक स्पष्ट एवं समान परिभाषा पेश की गई है।
इसमें कहा गया है कि संशोधित ढांचा लगातार निगरानी, विश्वास आधारित शासन और एक समान राष्ट्रीय सहमति तंत्र के जरिये पर्यावरण संरक्षण और व्यापार सुगमता के बीच तालमेल स्थापित करता है।
भाषा पारुल प्रशांत
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