मतदाताओं के नाम जोड़ना और हटाना मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया का हिस्सा : न्यायालय
अविनाश
- 28 Jan 2026, 08:59 PM
- Updated: 08:59 PM
नयी दिल्ली, 28 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना और हटाना निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए मतदाता सूची पुनरीक्षण का हिस्सा है। न्यायालय ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली 19 याचिकाओं के एक समूह पर अंतिम सुनवाई फिर शुरू की।
आधार कार्ड को पहचान के एक प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जाने के मुद्दे पर शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जालसाजी की आशंका मात्र 12 अंकों वाले बायोमेट्रिक पहचान पत्र को खारिज करने का आधार नहीं बन सकती।
यह देखते हुए कि पासपोर्ट भी सार्वजनिक दायित्वों का निर्वहन करने वाली निजी एजेंसियों के माध्यम से जारी किए जाते हैं, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, "यदि कोई दस्तावेज कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसे जारी करने में एक निजी संस्था शामिल है।"
जब याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने मतदाता सूची से नामों को बड़े पैमाने पर हटाए जाने का आरोप लगाया, तो प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "नामों को जोड़ना और हटाना मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया का हिस्सा है।"
पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, प्रशांत भूषण, विजय हंसारिया और स्वयं याचिकाकर्ता योगेंद्र यादव की ओर से प्रतिवाद प्रस्तुतियां सुनीं।
अदालत ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में अंतिम बहस शुरू की थी, जिसमें उसने कहा था कि मतदाता सूची में नामों को शामिल करना या हटाना भारत निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
निर्वाचन आयोग ने एसआईआर कवायद का बचाव करते हुए कहा है कि आधार और मतदाता पहचान पत्रों को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने इस प्रक्रिया के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि नागरिकता निर्धारित करने के लिए आधार पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि आधार अधिनियम के तहत, भारत में 182 दिनों तक रहने वाले विदेशी नागरिक भी नामांकन के पात्र हैं और कानून यह स्पष्ट करता है कि आधार नागरिकता या अधिवास प्रदान नहीं करता है।
न्यायमूर्ति बागची ने इस बात का खंडन करते हुए कहा कि जालसाजी की आशंका अकेले आधार कार्ड को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती, क्योंकि पासपोर्ट भी सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन करने वाली निजी एजेंसियों के माध्यम से ही तैयार किए जाते हैं।
हंसारिया ने कहा कि किसी भी याचिकाकर्ता ने नागरिकता के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड को शामिल करने की मांग नहीं की थी और तर्क दिया कि अदालत ऐसी प्रार्थना के बिना 'परमादेश' जारी नहीं कर सकती।
सिब्बल ने तर्क दिया कि यद्यपि निर्वाचन आयोग को अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव कराने की पूर्ण शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम के तहत पूरी तरह से केंद्र सरकार के पास है।
सिब्बल ने संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 का हवाला देते हुए कहा, "यह कौन तय करता है कि मैं भारत का नागरिक हूं या नहीं? यह भारत सरकार तय करती है, न कि निर्वाचन आयोग।"
सुनवाई के बृहस्पतिवार को पूरी होने की उम्मीद है।
भाषा प्रशांत अविनाश
अविनाश
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