दिल्ली की अदालत ने मानहानि मामले में मेधा पाटकर को सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बरी किया
प्रशांत
- 25 Jan 2026, 02:47 PM
- Updated: 02:47 PM
नयी दिल्ली, 25 जनवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना द्वारा दायर मानहानि के आपराधिक मामले में बरी कर दिया है। यह मामला 2006 में एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान उनके द्वारा की गई टिप्पणियों से संबंधित था। अदालत ने कहा कि सक्सेना कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को रिकॉर्ड करने वाले मूल रिकॉर्डिंग उपकरण या संपूर्ण वीडियो फुटेज को प्रस्तुत करने में विफल रहे।
पाटकर द्वारा मानहानिकारक बयान दिए जाने की बात को साबित करने वाला कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य न होने पर अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 500 के तहत आरोप से बरी कर दिया।
शिकायत के अनुसार, पाटकर ने एक कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर कहा था कि सक्सेना एवं उनके गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) को सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े निर्माण कार्य संबंधी ठेके मिले थे।
सक्सेना तब 'नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज' (एनसीसीएल) के अध्यक्ष थे। उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया था कि उन्हें और उनके एनजीओ को सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े सिविल ठेके मिले थे।
प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने कहा, ''यह साबित करने में सक्षम एकमात्र दस्तावेज वह मूल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होगा, जिसमें ये बयान रिकॉर्ड किए गए थे।''
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि पाटकर कार्यक्रम के पैनल में शामिल नहीं थीं और प्रसारण के दौरान उनकी केवल एक संक्षिप्त वीडियो क्लिप दिखाई गई थी जिसे पहले से रिकॉर्ड किया गया था।
उसने कहा, ''यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि न तो ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड करने वाले रिपोर्टर को और न ही आरोपी को आपत्तिजनक बयान देते हुए देखने वाले किसी भी व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश किया गया है।''
न्यायाधीश ने कहा, ''यह भी ध्यान देने योग्य है कि कार्यक्रम में दिखाई गई क्लिप आरोपी के साक्षात्कार या संवाददाता सम्मेलन का एक बहुत छोटा अंश प्रतीत होती है।''
मजिस्ट्रेट ने कहा कि यह निर्धारित करने के लिए कि क्या कोई मानहानिकारक टिप्पणी की गई थी, संबंधित साक्षात्कार या संवाददाता सम्मेलन की पूरी वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग प्रस्तुत करना आवश्यक है।
अदालत ने कहा, ''पूरी क्लिप या फुटेज की समीक्षा किए बिना आरोपी के भाषण के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।''
शिकायत मूल रूप से अहमदाबाद में दायर की गई थी और उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर इसे 2010 में दिल्ली स्थानांतरित किया गया था।
सक्सेना द्वारा दायर एक अलग मानहानि मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अगस्त 2025 में अधीनस्थ अदालत द्वारा पाटकर को दोषी ठहराए जाने के आदेश को बरकरार रखा था लेकिन उन पर लगाया गया एक लाख रुपये का जुर्माना रद्द कर दिया था।
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