इतिहास को टुकड़ों में नहीं पढ़ाया जा सकता, मुगलों को पाठ्यपुस्तकों से हटाना 'बेतुका' : रोमिला थापर
सिम्मी
- 25 Jan 2026, 10:15 AM
- Updated: 10:15 AM
(माणिक गुप्ता)
कोझिकोड, 25 जनवरी (भाषा) प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर ने कहा है कि इतिहास एक निरंतर प्रक्रिया है और इसे टुकड़ों में नहीं पढ़ाया जा सकता। उन्होंने मुगलों जैसे संपूर्ण राजवंशों को पाठ्यपुस्तकों से हटाने के चलन को "बेतुका" करार दिया।
केरल साहित्य महोत्सव (केएलएफ) के नौवें संस्करण को शनिवार को ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करते हुए थापर ने सोशल मीडिया पर 'लोकप्रिय इतिहास' के बढ़ते प्रभाव, नारीवादी इतिहास के महत्व और मौजूदा ज्ञान पर सवाल उठाने में शिक्षा की केंद्रीय भूमिका सहित कई विषयों पर बात की।
उन्होंने कहा, ''जो कुछ हो रहा है, जैसे कि इतिहास के कुछ हिस्सों को पाठ्यक्रम से हटा दिया जा रहा है या हमें बताया जा रहा है कि उन्हें पढ़ने की जरूरत नहीं है, वह बेतुका है। इतिहास एक निरंतर प्रक्रिया है। यह लोगों और संस्कृतियों, व्यवहार के तरीकों और सोच के विकास की कहानी है।''
करीब 25 शोधपरक पुस्तकों की लेखिका थापर ने 'विमन राइटिंग हिस्ट्री: थ्री जेनरेशंस' सत्र के दौरान कहा, ''इतिहास की इस निरंतरता को यह कहकर नहीं तोड़ा जा सकता कि 'ठीक है, हम इस राजवंश को हटा देते हैं, हम मुगलों को हटा देते हैं।' इससे इतिहास खंडित हो जाता है और उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।''
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने 2025-26 शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा सात की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कथित तौर पर संशोधन किया है, जिसमें दिल्ली सल्तनत और मुगलों से संबंधित अध्याय हटा दिए गए हैं।
इसके साथ ही संशोधित पाठ्यपुस्तक में मौर्य, शुंग और सातवाहन जैसे प्राचीन भारतीय राजवंशों के साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं और पवित्र स्थलों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है।
इतिहासकार ने सोशल मीडिया पर ''लोकप्रिय इतिहास'' के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जताई और कहा कि यह अक्सर विद्वतापूर्ण शोध और राय के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है।
उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अतीत की घटनाओं की सटीक व्याख्या के लिए पेशेवर इतिहासकारों के लेखन और वक्तव्यों पर भरोसा करें।
उन्होंने कहा, "अब लोकप्रिय इतिहास और पेशेवर इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास के बीच स्पष्ट अंतर है। किसी ऐतिहासिक कथन का हवाला देते समय यह समझना जरूरी है कि वह किसी पेशेवर ऐतिहासिक लेखन से आया है या सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी राय से।"
इतिहासकार के रूप में अपने जीवन पर बात करते हुए थापर ने कहा कि उन्होंने भले ही हमेशा सचेत रूप से महिला दृष्टिकोण से इतिहास न लिखा हो, लेकिन जहां संभव हुआ, वहां नारीवादी दृष्टिकोण को शामिल करने का प्रयास किया।
उन्होंने पेशेवर क्षेत्रों में महिलाओं की स्वायत्तता और सम्मान की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि नारीवादी इतिहास लिखना जरूरी है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण स्वतंत्रता, तार्किक सोच और बौद्धिक आजादी के लिए खड़े होकर "नारीवादी की तरह व्यवहार करना" है।
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि हमें नारीवादी इतिहास लिखना चाहिए लेकिन यदि मैं ऐसा नहीं भी कर रही हूं तो कम से कम एक नारीवादी की तरह व्यवहार तो कर रही हूं। एक आत्मनिर्भर महिला किसी भी समाज का अनिवार्य घटक है।"
केएलएफ 2026 का रविवार को समापन होगा।
भाषा
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