निर्वाचन आयोग ने एसआईआर को निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित बताया
माधव
- 22 Jan 2026, 08:37 PM
- Updated: 08:37 PM
नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा) निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करने संबंधी निर्णय को ''निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित'' बताया और उच्चतम न्यायालय से बिहार में इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह किया।
इसने दलील दी कि कुछ गैर सरकारी संगठनों और नेताओं के इशारे पर विशेष पड़ताल के नाम पर बिना किसी ठोस आधार के जांच नहीं की जा सकती।
निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा, ''
बिहार एसआईआर में जिन 66 लाख लोगों के नाम हटाये गये थे, उनमें से कोई भी इस अदालत या उच्च न्यायालय में नहीं आया और न ही उन्होंने निर्वाचन आयोग के समक्ष कोई याचिका दायर की। एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स), पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी) तथा कुछ सांसदों के कहने पर बिना किसी ठोस आधार के जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती।''
वरिष्ठ वकील ने बिहार समेत विभिन्न राज्यों में निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर करने के निर्णय को चुनौती देने संबंधी याचिकाओं की अंतिम सुनवाई के दौरान ये दलीलें पेश कीं।
उन्होंने उस फैसले का जिक्र किया जिसमें शीर्ष अदालत ने मतपत्रों को फिर से लागू करने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी। उन्होंने कहा, ''संक्षेप में, हमें यूरोप का अनुसरण करना चाहिए। अगर वे ईवीएम को अपनाते हैं, तो हमें भी इसे अपनाना चाहिए। और अगर वे मतपत्रों को अपनाते हैं, तो हमें भी इसे अपनाना चाहिए।''
उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति अखबार में लेख लिखता है और दूसरा व्यक्ति उसी का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करता है।
द्विवेदी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ से अपील की कि वे एसआईआर का बचाव करते हुए याचिकाओं को खारिज कर दें और साथ ही जुर्माना भी लगाया जाये, क्योंकि एसआईआर की कवायद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत वैधानिक शक्तियों का एक वैध और पारदर्शी प्रयोग है।
उन्होंने दलील दी कि एक बार जब निर्वाचन आयोग 1950 के अधिनियम की धारा 21(3) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करता है, तो विशेष पुनरीक्षण करने का तरीका और प्रक्रिया पूरी तरह से उसके विवेक पर निर्भर करती है।
उन्होंने कहा कि बिहार में लगभग 20 साल से एसआईआर कवायद नहीं की गई थी और इसे शहरीकरण और जनसंख्या के आवागमन समेत बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को देखते हुए किया गया।
हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अगर निर्वाचन आयोग का यह तर्क मान लिया जाता है कि धारा 21(3) बिना किसी रोक-टोक के विवेक का अधिकार देती है, तो ''मामला वहीं खत्म हो जाएगा।''
न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि क्या बदला हुआ नागरिकता ढांचा मौजूदा एसआईआर का कारण था, और कहा कि निर्वाचन आयोग के आदेश में साफ तौर पर सीमा पार या अवैध प्रवासन को इसका आधार नहीं बताया गया था।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ''आमतौर पर 'प्रवासन' शब्द का मतलब कानूनी आवाजाही होता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना संवैधानिक अधिकार है''।
द्विवेदी ने कहा कि यह संशोधन पहले कभी लागू नहीं किया गया था और मौजूदा एसआईआर बदले हुए कानूनी ढांचे पर ध्यान देने का एक सही मौका देता है।
उन्होंने साफ किया कि मकसद संविधान के अनुच्छेद 326 के दायरे में नागरिकता की जांच करना था, जो वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है।
पारदर्शिता पर जोर देते हुए, द्विवेदी ने कहा कि बूथ स्तर के एजेंट (बीएलए) घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं, मतदाताओं को पांच करोड़ से अधिक एसएमएस अलर्ट भेजे गए और इस प्रक्रिया में कड़ाई से प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया।
उन्होंने बताया कि लगभग 76 प्रतिशत मतदाताओं को कोई दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं थी, जबकि अन्य को 11 निर्धारित दस्तावेजों में से किसी एक को प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई थी।
द्विवेदी ने कहा कि एसआईआर को ''स्पष्ट रूप से मनमाना'' नहीं कहा जा सकता।
भाषा
देवेंद्र माधव
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