आकांक्षाओं को पूरा करने की क्षमता लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रासंगिक बनाए रखती है: ओम बिरला
नेत्रपाल अविनाश
- 16 Jan 2026, 08:57 PM
- Updated: 08:57 PM
(तस्वीरों के साथ)
नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं तभी मजबूत और प्रासंगिक बनी रह सकती हैं जब वे पारदर्शी, समावेशी, उत्तरदायी और जनता के प्रति जवाबदेह हों।
वह राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन (सीएसपीओसी) के शुक्रवार को संपन्न होने के अवसर पर बोल रहे थे।
सीएसपीओसी के 28वें सम्मेलन के विशेष पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए, बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों का सर्वोपरि कर्तव्य संवैधानिक मूल्यों में दृढ़ रहते हुए लोकतांत्रिक संस्थानों को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर रूप से ढालना है।
उन्होंने कहा कि संसदों का वास्तविक महत्व नागरिकों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की उनकी क्षमता में निहित है। उन्होंने यह सुनिश्चित करते पर जोर दिया कि बहस सार्वजनिक चिंताओं के सार्थक समाधान की ओर ले जाएं।
बिरला ने कहा कि आम सहमति और असहमति दोनों ही लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन इन्हें संसदीय मर्यादा के दायरे में ही व्यक्त किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में, सदन की गरिमा की रक्षा करने, निष्पक्षता सुनिश्चित करने और संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करने में पीठासीन अधिकारी की भूमिका को निर्णायक बताया गया है।
बिरला ने समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि निर्णय लेने में खुलापन सुनिश्चित करके पारदर्शिता जनता के विश्वास को बढ़ावा देती है, जबकि समावेशिता गारंटी देती है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हर आवाज - विशेष रूप से हाशिए पर रहने वालों की - सुनी जाए और उसे महत्व दिया जाए।
उन्होंने कहा, ‘‘ये सिद्धांत मिलकर लोकतांत्रिक संस्थानों की वैधता को बनाए रखते हैं और नागरिकों तथा राज्य के बीच के स्थायी बंधन को मजबूत करते हैं।’’
बिरला ने इस अवसर पर 29वें सीएसपीओसी की अध्यक्षता ब्रिटेन के ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ के अध्यक्ष लिंडसे होयल को सौंप दी।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल के लोकतांत्रिक विधायी निकायों के बीच निरंतर संवाद सुनिश्चित करने और संसदीय दक्षता एवं जवाबदेही बढ़ाने के नए तरीकों का पता लगाने के लिए सीएसपीओसी की कल्पना 56 साल पहले की गई थी।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा, ‘‘सीएसपीओसी के इतिहास में सबसे अधिक देशों की भागीदारी इस सम्मेलन की मुख्य विशेषता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यह व्यापक और समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगा कि नयी दिल्ली सम्मेलन को राष्ट्रमंडल संसदीय सहयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर के रूप में याद किया जाए।’’
बिरला ने यह भी कहा कि संसद में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग, सोशल मीडिया के प्रभाव, चुनावों से परे नागरिक भागीदारी और सांसदों तथा संसदीय कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं कल्याण पर हुई चर्चाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘इस विचार-विमर्श ने पीठासीन अधिकारियों को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर उनकी विकसित होती भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के बारे में अधिक स्पष्टता प्राप्त करने में मदद की, जहां लोकतांत्रिक परंपराएं तेजी से हो रहे तकनीकी परिवर्तन के साथ मिलती हैं।’’
बिरला ने कहा कि प्रौद्योगिकी, समावेशिता और वैश्विक साझेदारी नयी विश्व व्यवस्था को आकार देंगी।
सम्मेलन में बड़ी संख्या में उपस्थित होने के लिए प्रतिनिधियों को धन्यवाद देते हुए, बिरला ने अंतर-संसदीय संघ अध्यक्ष तुलिया एकसन और राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के अध्यक्ष क्रिस्टोफर कलीला की उपस्थिति एवं योगदान की सराहना की।
भाषा नेत्रपाल